Home » ताजा खबर » भगवान चित्रगुप्त जी का प्राकट्योत्सव: कर्मों का लेखा-जोखा और जीवन के गूढ़ रहस्य

भगवान चित्रगुप्त जी का प्राकट्योत्सव: कर्मों का लेखा-जोखा और जीवन के गूढ़ रहस्य

आज भगवान श्री चित्रगुप्त जी का जन्मोत्सव हैं एवं थाली में झूठा भोजन नहीं छोड़ना चाहिए, पांच वस्तु ऐसी हैं जो अपवित्र होते हुए भी पवित्र हैं आओ जानें :

आज़ हमारे कर्मों का लेखा-जोखा रखने वाले भगवान चित्रगुप्त जी का प्राकट्योत्सव है, भगवान चित्रगुप्त जी का प्राकट्योत्सव वैशाख शुक्ल सप्तमी को मनाया जाता है, जो इस वर्ष 23 अप्रैल 2026 को है। उन्हें ब्रह्मांड के प्रथम “डेटा वैज्ञानिक” या मुनीम के रूप में जाना जाता है, जो समस्त जीवों के कर्मों का लेखा-जोखा रखते हैं।

ब्रह्मा जी की काया से जन्म :
जब यमराज जी ने ब्रह्मा जी से जीवों के कर्मों का हिसाब रखने के लिए एक सहायक माँगा, तब ब्रह्मा जी 11,000 वर्षों के ध्यान में लीन हो गए। उनके शरीर (काया) से एक पुरुष प्रकट हुए, जिनके हाथ में कलम और दवात थी। ब्रह्मा जी के ‘चित्त’ (मन) में ‘गुप्त’ रूप से स्थित होने के कारण उनका नाम चित्रगुप्त पड़ा।

किसी भी शुभ कार्य क़ो करने के लिए कल 24 अप्रैल शुक्रवार पुष्य नक्षत्र बहुत ही अच्छा दिन रहेगा…

कायस्थों के आराध्य :
ब्रह्मा जी की ‘काया’ से उत्पन्न होने के कारण उनकी संतानें कायस्थ कहलाईं।

दोहरा वर्ण : उन्हें ब्राह्मण (वेदों के ज्ञाता) और क्षत्रिय (न्यायकर्ता) दोनों के कर्तव्य सौंपे गए हैं।

प्रमुख कार्य और स्वरूप :
1. कर्मों का लेखा-जोखा : भगवान चित्रगुप्त जी ‘अग्रसंधानी’ नामक रजिस्टर में हर जीव के अच्छे और बुरे कर्मों को दर्ज करते हैं। मृत्यु के बाद, उनके इसी रिकॉर्ड के आधार पर यमराज न्याय करते हैं कि आत्मा को स्वर्ग मिलेगा या नरक।
2. प्रतीक चिन्ह : उनके चित्रों में उन्हें अक्सर कलम, दवात (स्याही), पुस्तक और कभी-कभी कमर में तलवार (करवाल) धारण किए हुए दिखाया जाता है।
3. पारिवारिक विवरण : भगवान चित्रगुप्त के दो विवाह हुए और उनके 12 पुत्र हुए, जिनसे कायस्थों की 12 शाखाएँ बनीं।
4. (A) माता नंदिनी (सूर्यदक्षिणा) : इनसे 4 पुत्र हुए – भानु, विभानु, विश्वभानु और वीर्यभानु।
4. (B) माता एरावती (शोभावती) : इनसे 8 पुत्र हुए – चारु, चितचारु, मतिभान, सुचारु, चारुण, हिमवान, चित्र और अतिन्द्रिय।
5. पूजन का महत्व : वर्ष में दो बार मुख्य पूजा औऱ एक वैशाख शुक्ल सप्तमी (प्राकट्योत्सव) को और दूसरी कार्तिक शुक्ल द्वितीया (यम द्वितीया/भाई दूज) के दिन।
6. कलम-दवात की पूजा : इस दिन लोग अपनी लेखनी (कलम) और कागज की पूजा करते हैं। भक्त अपनी आय-व्यय का विवरण भगवान के सामने रखते हैं और जाने-अनजाने में हुए पापों के लिए क्षमा मांगते हैं।
7. उनकी पूजा के समय इस प्रसिद्ध मंत्र का जाप किया जाता है- “मसिभाजनसंयुक्तं ध्यायेत्तं च महाबलम्। लेखनीपट्टिका हस्तं चित्रगुप्तं नमाम्यहम्॥” अर्थात मैं उन महाबली चित्रगुप्त को नमन करता हूँ, जिनके हाथों में स्याही का पात्र, कलम और पट्टिका सुशोभित है।

8. थाली में झूठा भोजन नहीं छोड़ना चाहिए : रामायण के अनुसार सीता खोज के समय हनुमानजी ने जब रावण की रसोई मेंं प्रवेश किया तब रावण की जूठी थाली देख कर हनुमानजी समझ गये कि रावण की मृत्यु निकट आ गई है, क्योंकि रावण ने थाली में दही जूठा छोड़ रखा था। भोजन में जूठा छोड़ने वाले की आयु कम होती जाती है। शायद इसी कारण से हमारे पूर्वज खाना खाकर थाली में पानी डाल कर फिर जूठन को घोल कर पी जाया करते थे।
विद्वानों के अनुसार थाली में जूठा भोजन छोड़ना मां अन्नपूर्णा और मां लक्ष्मी का अपमान माना जाता है। ऐसा करने से आर्थिक स्थिति कमजोर होती है। साथ ही घर आती लक्ष्मी भी रूठ कर चली जाती है।

भोजन जूठा छोड़ने वाले बच्चे पढ़ाई में कमजोर होते चले जाते हैं। मन पढ़ाई से धीरे धीरे पूरी तरह हट जाता है। इसलिए बच्चे पहली बार में जितना खा सकते हैं उतना ही परोसें।

थाली में जूठा भोजन छोड़ने से शनि का प्रकोप झेलना पड़ सकता है। इसके साथ ही चंद्रमा की भी अशुभ दृष्टि व्यक्ति के जीवन पर पड़ने लग जाती है। चंद्रमा की भी अशुभ दृष्टि की वजह से मानसिक बीमारियां भी व्यक्ति को घेर लेती हैं।

इसके अलावा यदि आप यात्रा के दौरान जूठा भोजन फेंकते हैं तो आपके काम कभी नहीं बनते या बनते काम भी बिगड़ने शुरू हो जाते हैं।

थाली में जूठा भोजन छोड़ने से व्यक्ति पाप का भागी बनता है। इसलिए थाली में भोजन उतना ही लेना चाहिए जितना खा सकें और कोशिश करें कि कभी भी भोजन व्यर्थ न हो। यदि किसी कारण वश भोजन थाली में छूट जाता है तो हाथ जोड़कर मां अन्नपूर्णा से माफी मांगे।

बहुत बढिया :
खाओ मण भर.
छोड़ो न कण भर…

उतना ही लो थाली में,
व्यर्थ न जाये नाली में…

हमारी इन १० विशेष परंपराओं के आगे तो विज्ञान भी है नतमस्तक होता हैं :

हमारे देश में जितनी विविधता देखने को मिलती है, उतनी ही विशेष है यहां की अलग-अलग संस्कृति और परंपराएं.

जी हां, हिंदू धर्म में कई ऐसी परंपराएं है जिनका पालन सदियों से होता आ रहा है.

हिंदू धर्म की परंपराओं का पालन करते हुए आज भी लोग अपने से बड़ों के पैर छूते हैं और शादीशुदा महिलाएं आज भी अपने मांग में सिंदूर जरूर लगाती हैं. इन परंपराओं के पीछे वैज्ञानिक तर्क भी है.

1. पैर छूना : हिंदू धर्म की परंपराओं में अपने से बड़ों के पैर छूना भी शामिल है. आज के इस आधुनिक युग में भी अधिकांश लोग अपने से बड़ों से मिलने पर उनके चरण स्पर्श करते हैं. इस परंपरा को विज्ञान भी सलाम करता है क्योंकि चरण स्पर्श करने से दिमाग से निकलनेवाली एनर्जी हाथों और सामने वाले पैरों से होते हुए एक चक्र पूरा करती है।
2. नमस्ते करना : जब भी हम किसी से मिलते हैं अपने हाथ जोड़कर उसे नमस्ते जरूर करते हैं. नमस्ते करने के लिए जब हम हाथ जोड़ते हैं तो हमारी उंगलियां एक-दूसरे को स्पर्श करती हैं जिससे पैदा होनेवाले एक्यूप्रेशर से हमारी आंखों, कानों और दिमाग पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसके अलावा हाथ मिलाने की जगह नमस्ते करने से हम सामने वाले व्यक्ति के संपर्क में नहीं आते हैं, जिसकी वजह से उसके हाथों के बैक्टीरिया हमारे संपर्क में नहीं आते हैं।
3. स्त्रियों का मांग भरना : शादीशुदा महिलाएं अपने मांग में सिंदूर भरती हैं और इस परंपरा के पीछे भी वैज्ञानिक तर्क छुपा हुआ है. बताया जाता है कि सिंदूर में हल्दी, चूना और मरकरी होता है जो शरीर के ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करता है. सिंदूर महिलाओं में यौन उत्तेजना बढ़ाता है जिसके चलते विधवा औरतों के सिंदूर लगाने पर पाबंदी होती है।
4. माथे पर तिलक लगाना : किसी भी मांगलिक कार्य के दौरान महिलाएं और पुरुष अपने माथे पर तिलक लगाते हैं. इसके पीछे वैज्ञानिक मान्यता है कि कुमकुम या तिलक लगाने से हमारी आंखों के बीच माथे तक जाने वाली नस में एनर्जी बनी रहती है. तिलक लगाने से चेहरे की कोशिकाओं में ब्लड सर्कुलेशन बना रहता है।
5. जमीन पर बैठकर खाना : आज भी अधिकांश घरों में लोग अपने परिवार के सदस्यों के साथ जमीन पर बैठकर खाना खाते हैं. जमीन पर पालथी मारकर बैठने को एक योग आसन माना गया है. इस आसन में बैठकर खाने से दिमाग शांत रहता है और पाचन क्रिया ठीक होती है।
6. कान छिदवाना : कान छिदवाना भारतीय परंपराओं में शामिल है. सदियो पुरानी इस परंपरा के पीछे जो तर्क बताया गया है उसके मुताबिक कान छिदवाने से इंसान की सोचने की शक्ति बढ़ती है. वैज्ञानिक तर्क के अनुसार कान छिदवाने से बोली अच्छी होती है और कानों से होकर दिमाग तक जानेवाली नस में ब्लड सर्कुलेशन बना रहता है।
7. सिर पर चोटी : हिंदू धर्म में आज भी अधिकांश ब्राह्मण अपने सिर पर शिखा रखते हैं. इस शिखा के बारे में कहा जाता है कि सिर पर जिस जगह पर चोटी रखी जाती है उस जगह पर दिमाग की सारी नसें आकर मिलती हैं. जो एकाग्रता बढ़ाने, गुस्से को कंट्रोल करने और सोचने की शक्ति को बढ़ाने में मदद करती हैं।
8. उपवास रखना : हिंदू धर्म में उपवास रखने की परंपरा बहुत पुरानी है. आयुर्वेद के अनुसार व्रत से पाचन क्रिया अच्छी होती है. एक रिसर्च के अनुसार व्रत रखने से कैंसर का खतरा भी कम होता है. इसके साथ ही दिल की बीमारियां और डायबिटीज जैसी बीमारियों का खतरा कम होता है।
9. तुलसी की पूजा : आज भी अधिकांश घरों में तुलसी का पौधा लगाकर उसकी पूजा की जाती है. वैज्ञानिक मान्यताओं के अनुसार तुलसी का पौधा इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाने में मदद करता है. यह एक आयुर्वेदिक औषधि भी है जिसका इस्तेमाल कई बीमारियों के इलाज में किया जाता है।
10. मूर्ति की पूजा : हिंदू धर्म में लोग देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए मूर्ति पूजा करते हैं। मूर्ति पूजा के पीछे छुपे वैज्ञानिक तर्क के अनुसार मूर्ति दिमाग को एक जगह पर स्थिर रखने में मदद करती है।

हिंदू धर्म में इन परंपराओं को काफी महत्व दिया गया है जिसका लोग सदियों से पालन करते आ रहे हैं और विज्ञान भी इन परंपराओं के आगे नतमस्तक है।

पांच वस्तु ऐसी हैं जो अपवित्र होते हुए भी पवित्र हैं :
उच्छिष्टं शिवनिर्माल्यं
वमनं शवकर्पटम् ।
काकविष्टा ते पञ्चैते
पवित्राति मनोहरा॥

1. उच्छिष्ट : गाय का दूध पहले उसका बछडा पीकर उच्छिष्ट करता है। फिर भी वह पवित्र ओर शिव पर चढता है।
2. शिव निर्माल्यं – गंगा का जल, गंगा जी का अवतरण स्वर्ग से सीधी शिव जी के मस्तक पे आई नियमानुसार शिव जी पर चढायी हुइ हर चीज़ निर्माल्य है पर गंगाजल पवित्र है.
3. वमनम्—उल्टी—शहद : मधुमख्खी जब फूलो का रस लेके अपने छल्ले पे आती है , तब वो अपने मुख से उसे निकालती है, जिससे शहद बनता है, जो पवित्र कार्यो मे लिया जाता है.
4. शव कर्पटम्— रेशमी वस्त्र:धार्मिक कार्यो को संपादित करने के लिये पवित्रता की आवश्यकता रहती है , रेशमी वस्त्र को पवित्र माना गया है, पर रेशम को बनाने के लिये रेशमी किडें को उबलते पानी मे डाला जाता है, ओर उसकी मौत हो जाती है उसके बाद रेशम मिलता है तो हुआ शव कर्पट फिर भी पवित्र है।
5. काक विष्टा— कौए का मल कौवा पीपल वगेरे पेडो के फल खाता है, ओर उन पेडो के बीज अपनी विष्टा मे इधर उधर छोड देता है, जीसमे से पेडो की उत्पत्ति होती है, आपने देखा होगा की कही भी पीपल के पेड उगते नहि हे बल्कि पीपल काक विष्टा से उगता है, फिर भी पवित्र है।

sssrknews
Author: sssrknews

इस खबर पर अपनी प्रतिक्रिया जारी करें

Leave a Comment

Share This