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2 साल का बच्चा, घना जंगल और माँ की तलाश में बीती एक डरावनी रात

2 साल। नंगे पांव। घना जंगल। 20 घंटे। अकेला।
यह किसी फिल्म का दृश्य नहीं है।
यह मध्य प्रदेश की घटना है। आज की। 2026 की।

मैं यह खबर सुबह से कई बार पढ़ रहा हूं और हर बार एक पल के लिए सब कुछ थम जाता है।

सिर्फ एक तस्वीर दिमाग में आती है:

एक नन्हा बच्चा। दो साल का। नंगे पांव। निचले हिस्से पर कपड़े नहीं। मध्य प्रदेश के रायसेन के उस घने जंगल में, जहां रात को जंगली जानवरों की आवाजें आती हैं- अकेला भटक रहा है। घंटों कई किलोमीटर।

वो चल रहा है। किसी को नहीं जानता कि कहां जाना है। बस चल रहा है।

शायद मां को ढूंढ रहा है।

3 मई 2026।

विदिशा जिले के हिनोतिया गांव के राजेंद्र अहिरवार ने अपनी पत्नी ज्योति (27 साल) को यह कहकर घर से लेकर निकला था कि मोबाइल खरीदने जाना है।

वह ज्योति और बच्चे को लेकर जंगल की ओर चला गया। वहां राजेंद्र ने पत्थर उठाया। और ज्योति की कहानी वहीं खत्म हो गई।

एसपी रोहित कश्वानी ने पुष्टि की, राजेंद्र ने अपने 2 साल के बेटे को उसी जंगल में अकेला छोड़ा और फरार हो गया।

रात हुई। जंगल में अंधेरा छाया। वो बच्चा, जो अभी ठीक से बोलना भी नहीं जानता वहां अकेला था।

परिवार ने जब इंतजार किया और कोई नहीं लौटा तो पुलिस को ख़बर दी।

पुलिस, ड्रोन, डॉग स्क्वॉड, रातभर जंगल में उस एक नन्हीं सांस को ढूंढते रहे।

और सुबह करीब 8:30 बजे, जब वो बच्चा मिला, वो अपने मूल स्थान से लगभग 2 किलोमीटर दूर पैदल चल चुका था।
दो साल का बच्चा। 2 किलोमीटर। अकेला। रात के जंगल में।

वो जिंदा था।

मेरा दिल एक और सवाल पर अटका है

उन 20 घंटों में उस बच्चे के भीतर क्या हो रहा था?

विज्ञान इसका जवाब देता है। और यह जवाब, दिल को चीर देता है।

विजमैन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के 2025 के शोध में पाया गया, जब कोई शिशु अपनी मां से अलग होता है, तो उसके मस्तिष्क में ऑक्सीटॉसिन की सक्रियता असामान्य रूप से बढ़ जाती है, जैसे दिमाग़ चीख-चीख कर मां को पुकार रहा हो।
मां की अनुपस्थिति में शिशु का स्ट्रेस हार्मोन कोर्टिसोल तेजी से बढ़ता है। यह सिर्फ रोना नहीं है, यह शरीर का टूटना है। और यदि यह अलगाव लंबा हो तो इसका असर पूरी जिंदगी दिमाग की बनावट पर पड़ता है।
मां का स्पर्श, उसकी आवाज, उसकी गंध, यह सब एक नन्हे बच्चे के मस्तिष्क के विकास के लिए उतना ही जरूरी है जितना हवा और पानी।

मनोविज्ञान के इतिहास में हैरी हार्लो का वो प्रयोग याद है?

उन्होंने नन्हे बंदरों को दो “नकली मां” के साथ रखा, एक बिजली तार की बनी मां जो खाना देती थी, एक कपड़े की बनी पुतले वाली मां जो सिर्फ नर्म थी। और बंदर के बच्चे हमेशा हमेशा कपड़े की मां के पास गए।

क्योंकि प्राणी को भोजन से पहले ममता चाहिए।

यह सिर्फ भावना नहीं है। यह इवोल्यूशन है। करोड़ों साल पुरानी जीववैज्ञानिक प्रोग्रामिंग।

और उस जंगल में वो दो साल का बच्चा उसी प्रोग्रामिंग के सहारे जीवित रहा। शायद मां की गंध को खोजता रहा। शायद उसकी आवाज़ सुनने की कोशिश करता रहा।

लेकिन मां नहीं थी। क्योंकि उसके पिता ने उसे छीन लिया था।

और यह सिर्फ विदिशा में पहली नहीं हुआ, जब किसी अपने ने ही एक शिशु से उसकी मां को अलग कर दिया और उसे भटकने को छोड़ दिया।

हम ऐसी खबरें पढ़ते हैं। दुखी होते हैं। फिर भूल जाते हैं।

अगले रविवार 11 मई Mother’s Day है।

पूरी दुनिया में उस दिन मां को कार्ड मिलेगा। फूल मिलेंगे। केक मिलेगा। कई मोबाइल पर फोन कर विष करेंगे। कई व्हाट्सएप्प फेसबुक पर फोटो, वीडियो शेयर कर अपनी मां को बधाइयां देंगे।

मैं उस बच्चे के बारे में सोच रहा हूं जो अपनी मां के मृत शरीर के आस पास सारी रात उस जंगल में उसे खोजता रहा। रोता रहा। बिलखता रहा। हिचकता रहा। और भागता रहा। गिरता। उठता। फिर इधर से उधर दौड़ता। मां के लिए। शरीर के अथाह दर्द चोट को बिसरा कर मां के बस एक आलिंगन के लिए।

नहीं पता था कि मां जा चुकी है।

न उसे मां का चेहरा ही आगे याद रहेगा

मेरे बच्चे कभीकभी रात को डर जाते हैं और मैं देखता हूं कि कैसे वह नींद में ही सीधे अपनी मां से चिपक जाते हैं। लिपट जाते है। मां के शरीर से लगने पर जो सुकून जो ठंडक मिलती है, वह मैंने भी ताउम्र महसूस की है।
क्योंकि मां सिर्फ एक रिश्ता नहीं होती।

मां एक बच्चे की पूरी दुनिया होती है।

उसकी पहली आवाज। उसकी पहली गंध। उसकी पहली सुरक्षा। उसका पहला घर।

और जो इंसान उस दुनिया को छीन ले, वो सिर्फ हत्यारा नहीं है।

वो उस बच्चे से उसकी पूरी जिंदगी छीन रहा है। उसका भरोसा। उसका बचपन। उसकी नींद। उसके सपने।

विज्ञान कहता है, जो बच्चा मां के बिना बड़ा होता है :

उसके स्ट्रेस लेवल ज्यादा होते हैं। मुश्किलों से उबरने की ताकत कम होती है। और जिंदगी भर जुड़ाव में कठिनाई रहती है।

यानी वो बच्चा, जो आज बचाया गया, उसकी लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई।

वो जिंदगी भर उस एक रात का बोझ उठाएगा।

इस समाचार के जरिए एक निवेदन है आप सबसे
जहां भी घरेलू हिंसा दिखे, ‘चुप मत रहिए।’

किसी बच्चे को खतरे में देखें, Childline 1098 पर call करें।

अपने घर में, अपने पड़ोस में, किसी मां को तकलीफ में देखें, आगे आइए।

आपकी एक काल एक जान बचा सकती है।

उस बच्चे को दादा-दादी के पास सौंप दिया गया है।

वो सुरक्षित है, जिस्म से।

पर उसके भीतर, एक सवाल हमेशा रहेगा।

मां कहां गई?

और उस सवाल का जवाब, कोई नहीं दे सकता।

📌 स्रोत : NDTV, Times of India, Moneycontrol, Republic World, Weizmann Institute of Science (2025), NIH Research

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Author: sssrknews

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