सुप्रभात🙏
तुलसी जौं पै राम सों, नाहिन सहज सनेह।
मूंड़ मुड़ायो बादिहीं, भाँड़ भयो तजि गेह॥
तुलसी कहते हैं कि यदि श्री रामचंद्र जी से स्वाभाविक प्रेम नहीं है तो फिर वृथा ही मूंड मुंडाया, साधु हुए और घर छोडकर भाँड़ बने (वैराग्य का स्वांग भरा)।
भगवान जग्गनाथ ओर नीम……
छप्पन भोग का समय था—मंदिर में सुगंध ऐसी फैल रही थी जैसे पूरा जगन्नाथ धाम प्रेम से महक उठा हो। ढोल-नगाड़ों की गूंज, हवा में उठती तुलसी और घी की महक, और भक्तों की जय-जयकार… सब कुछ दिव्य था। पर भीड़ के बीच खड़ी एक बूढ़ी माँ का दिल अजीब सी बेचैनी से भरा था।
वो रोज़ मंदिर आती थी और भगवान जगन्नाथ को अपने बेटे की तरह देखती थी—एक माँ का स्नेह, एक माँ की चिंता।
उसके मन में बार-बार एक ही बात घूम रही थी—
“मेरे लाल को रोज़ इतना छप्पन भोग खिलाया जाता है… कहीं उसका कोमल पेट खराब न हो जाए।”
उस दिन शाम ढलते ही उसने अपने घर में बैठकर नीम की पत्तियाँ सुखाईं, पीसीं और बड़ी ममता से चूर्ण बनाया—जैसे कोई माँ अपने बच्चे की दवा तैयार करती है।
वो रात में मंदिर पहुँची, ताकि भीड़ न हो, शांति हो और वो भगवान को दवा दे सके।
लेकिन मंदिर के द्वार पर पहरा दे रहे द्वारपाल ने उसे रोका।
“रात में प्रवेश वर्जित है,” उसने कठोर आवाज़ में कहा।
और इससे पहले कि बूढ़ी माँ कुछ समझाती—उसके हाथ से नीम का चूर्ण छीनकर ज़मीन पर फेंक दिया।
नीम का पाउडर हवा में उड़ा… और बूढ़ी माँ की आँखों से आँसू बरस पड़े।
वो पत्थर की सीढ़ियों पर बैठकर रोने लगी—
“मेरे जगन्नाथ को दवा कौन देगा? कौन देखेगा मेरा बेटा रात को?”
उसकी सिसकियाँ मंदिर की दीवारों से टकराकर जैसे आसमान तक पहुँचा
उस रात महाराजा भी गहरी नींद में नहीं थे।
अचानक उन्हें एक विचित्र सपना आया।
सपने में भगवान जगन्नाथ स्वयं उनके सामने थे—चेहरे पर दर्द, आँखों में करुणा।
उन्होंने राजा से कहा—
“राजन! आज मेरा पेट दुख रहा है। मेरी माँ दवा लेकर आई थी, लेकिन तुम्हारे द्वारपाल ने उसे रोककर लौटा दिया। क्या एक बेटे का दर्द तुम नहीं समझ सके?”
राजा भय से काँपते हुए उठे—पसीने से भीगे हुए।
उन्हें लगा जैसे सच में भगवान पीड़ा से तड़प रहे हों।
सुबह होते ही वह किसी की प्रतीक्षा किए बिना घोड़े पर सवार होकर उसी बूढ़ी माँ के झोपड़े की ओर भागे।
माँ चूल्हे के पास बैठी सूखी आँखों से राख कुरेद रही थी।
राजा ने पहुँचते ही उसके पैरों पर झुककर कहा—
“माँ, अपराध क्षमा करो। भगवान ने स्वयं मुझे आदेश दिया है। तुम्हारा नीम चूर्ण मेरे प्रभु को अभी चाहिए।”
बूढ़ी माँ स्तब्ध रह गई—
जिस माँ की बात रात में किसी ने नहीं सुनी, उसके आँसू अब मानो भगवान ने खुद पोंछ दिए थे।
राजा ने उससे नया नीम चूर्ण बनवाया—
माँ ने उतनी ही ममता से फिर से पत्तियाँ पीसीं, जैसे अपने बच्चे के लिए औषधि बनाती हो।
जब चूर्ण मंदिर पहुँचा, पुजारियों ने पहली बार छप्पन भोग के बाद जगन्नाथ जी को वह औषधि अर्पित की।
मंदिर में जैसे दिव्य महक फैल गई—एक माँ के प्रेम की, उसकी पीड़ा की, उसकी पूजा की।
और कहते हैं—
जिस दिन से वह घटना घटी, उसी दिन से भगवान जगन्नाथ को हर रोज़ छप्पन भोग के बाद नीम का चूर्ण खिलाने की परंपरा शुरू हो गई।
क्योंकि भगवान चाहे जितने बड़े हों
एक माँ के लिए वो सदैव उसके छोटे से बच्चे ही रहते हैं।
ॐ भगवते विष्णुदेवाय नमः🪷





