केरल के अलप्पुझा ज़िले की रहने वाली देवकी अम्मा की कहानी सिर्फ पर्यावरण संरक्षण की नहीं, बल्कि संकल्प, धैर्य और निस्वार्थ सेवा की मिसाल है।
करीब चार–पाँच दशक पहले, जब जीवन ने उन्हें शारीरिक रूप से सीमित कर दिया, तब देवकी अम्मा ने हार नहीं मानी। खेती संभव नहीं रही, तो उन्होंने पेड़ लगाना शुरू किया। अकेले, बिना किसी सरकारी मदद या बड़े संसाधनों के।
धीरे-धीरे वह बंजर ज़मीन हरियाली में बदलने लगी। वर्षों की देखभाल और प्रेम से वहाँ एक घना ‘तपोवन’ खड़ा हो गया। आज उस जंगल में हजारों पेड़ हैं, औषधीय पौधे हैं, पक्षियों की चहचहाहट है और प्रकृति का संतुलित संसार है।
देवकी अम्मा को लोग प्यार से “पर्यावरण की माँ” कहते हैं क्योंकि उन्होंने सिर्फ पेड़ नहीं लगाए, बल्कि एक पूरी पारिस्थितिकी को जीवन दिया।
अब देश उनके इस असाधारण योगदान को पहचान रहा है।
देवकी अम्मा को पद्म श्री सम्मान से सम्मानित किया जाएगा।
यह सम्मान एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस सोच का है कि अगर नीयत साफ हो, तो एक इंसान भी आने वाली पीढ़ियों के लिए जंगल छोड़ सकता है।





