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“धुरंधर 2: शानदार सिनेमा या विवादों का तूफ़ान? एक दर्शक की संतुलित राय”

कल धुरंधर 2 देखी। जब से फिल्म रिलीज हुई है, दो विपरीत प्रतिक्रिया देख-सुन रहा हूं। शानदार और बकवास। हालांकि फिल्म को सराहने वालों की तादाद नकारने वालों के मुकाबले कई गुना ज्यादा है। उनका जुनून थियेटर के भीतर और बाहर हद तक देखा जा सकता है। फिर भी फिल्म देखते हुए दोनों तरह की प्रतिक्रिया लगातार जेहन में चलती रही। यूं कहिए कि दोनों प्रतिक्रियाओं की कसौटी पर ही पूरी फिल्म देखी। मैं फिल्मों की तकनीकी समीक्षा की सलाहियत नहीं रखता। लिहाज़ा उस पर अधिकारपूर्वक कुछ नहीं कह सकता। फिर भी सबसे ज्यादा जिस चीज ने प्रभावित किया वह है प्रयोगधर्मिता। पटकथा से लेकर फिल्मांकन और संगीत संयोजन तक हर स्तर पर फिल्म प्रयोगों का संधान करती दिखती है। यही बात मैंने फिल्म के पहले पार्ट में भी गौर की थी। इस फिल्म को अगर नकारात्मक दृष्टि से आंका जाए तो दो चीजें खटक सकती हैं- हिंसा का बीभत्स चित्रण और पूरी फिल्म के दौरान बेहद लाउड बैकग्राउंड म्यूजिक। मुमकिन है ये दोनों चीजें निर्देशक की प्रयोगधर्मिता का हिस्सा हो। लेकिन अगर निष्पक्ष समीक्षा की जाए तो फिल्म शानदार कास्ट, बेहतरीन अभिनय, सेट-शूटिंग लोकेशन और जबरदस्त एडिटिंग के लिए न सिर्फ सराही जाएगी, बल्कि मानना पड़ेगा कि यह बाकी एक्टर्स और फिल्ममेकर्स के लिए एक टेक्स्ट बुक है। सिनेमा जगत में यह फिल्म सिर्फ कमाई के लिए याद नहीं की जाएगी, बल्कि कमाई के कारणों के लिए भी मिसाल रहेगी।

अब प्रतिक्रिया की बात। जो लोग इसे मुस्लिम विरोधी बता रहे, उन्हें या तो सच की समझ नहीं या फिर वे एक ऐसी मानसिक बीमारी से ग्रस्त हैं जो उन्हें हर शय में एक ही रंग दिखाती है। पूरी फिल्म पाकिस्तान की पृष्ठभूमि पर है। माफिया गिरोहों के बीच वर्चस्व की जंग, इस जंग में सियासी घालमेल और भारत में आतंकी हमले की साजिशों का कथाक्रम। इसमें ‘मुस्लिम विरोध’ ढूंढने वाले वाकई गज़ब की अक्लो-नज़र रखते हैं। पूरी फिल्म जिस भूगोल में फिरती है, जाहिर है सारे किरदार एक ही कौम से आते हैं। फिर इस सियापा का क्या मतलब? हां, अगर सिख विरोधी कहते तो शायद कुछ पचता भी। क्योंकि फिल्म का नायक जो, सैनिक परिवार से है और सेना में भर्ती होना चाहता है, एक दबंग सिख विधायक की पाशविकता के कारण कातिल बन जाता है। उसी सिख समुदाय का युवक, जो नायक के बचपन का यार है, ड्रग्स कारोबार के जरिए पंजाब और भारत को तबाह करने का मंसूबा रखता है। खालिस्तान के सपने देखता है। मगर हल्ला यह कि फिल्म मुसलमानों के खिलाफ है। हद है!

जो लोग इस फिल्म को राजनीतिक प्रॉपगेंडा बता रहे, उनसे भी सहमति मुश्किल लगती है। अगर वे नोटबंदी की घोषणा को 60 हज़ार करोड़ के नकली नोट नेपाल के रास्ते भारत में भेजने की पाकिस्तानी साजिश नाकाम करने की चाल के तौर पर दिखाए जाने को सरकार के पक्ष में प्रॉपगेंडा मानते हैं तो उन्हें तथ्यात्मक रूप से इसे ख़ारिज करना चाहिए। बताना चाहिए कि यह झूठ है तो फिर सच क्या है? या फिर एक भारतीय एजेंट का पाकिस्तानी माफिया-आईएसआई नेटवर्क में घुसना, उस पर कब्जा और उसके खात्मे के पीछे परोक्ष रूप से हमारे एनएसए अजीत डोभाल के दिमाग़ को दिखाए जाने पर आपत्ति है? और अगर है तो क्यों? चलो मान लिया कि यह पूरी तरह सही नहीं। नैरेटिव गढ़ने की कोशिश है। तो भी उन्हें दर्द क्यों? दर्द तो पाकिस्तान और पाकिस्तानियों को होना चाहिए। हमें क्यों? और अगर चित्रण गलत है तो बिंदुवार उसे तर्को-तथ्यों के साथ ख़ारिज करो ना। सब्जेक्टिव समीक्षा करो, जजमेंटल न बनो। हो सकता है उन्हें उन डायलॉग पर ऐतराज हो जो अक्सर प्रधानमंत्री या उनके इको सिस्टम द्वारा कहा-दोहराया जाता रहा है। मसलन; यह नया भारत है जो घुसकर मारता है। या भारत विरोधियों की बौखलाहट- जब से चाय वाला आया है मुश्किलों का पहाड़ टूट पड़ा है। या फिर सर तन से जुदा के नारे। अब जो है सो है। अकेले आदित्य धर ने नहीं, पूरे देश ने यह महसूस किया है और तभी उन्होंने पिछले एक दशक में कभी विकल्प को मौका नहीं दिया।

फिल्म की शुरुआत में जितना लम्बा डिस्कलेमर दिया गया है, उतना आज तक किसी फिल्म में नहीं दिखा। निर्माताओं ने खुद स्पष्ट किया है कि फिल्म पूरी तरह वास्तविकता को प्रदर्शित नहीं करती। इसलिए देखते वक्त अपने विवेक का इस्तेमाल करें। मैं भी यही दोहराना चाहूंगा। अपने विवेक का इस्तेमाल करें। देश के दुश्मनों को बेनकाब करने की कोशिश के तौर पर फिल्म को लें। अपने एजेंट की जांबाज़ी और ख़ुफ़िया तंत्र के रणकौशल का मजा लें। सिनेमाई तकनीक की कसौटी पर फिल्म को परखें। अगर आप सियासी पूर्वाग्रह का चश्मा नहीं उतार सकते तो कुढ़ने से बेहतर है फिल्म न देखें। पैसे भी बचेंगे और खून भी नहीं जलेगा। फिल्म तो वैसे भी दो हजार करोड़ के बिजनस का रिकॉर्ड बनाने जा रही है।
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सच कहूं तो मुझे तो फिल्म में बस यही ख़राब लगा कि इधर लोग गैस सिलेंडर के लिए लाइन में लगे हैं और उधर आदित्य धर लाइन से गैस सिलेंडर उड़ा रहे हैं। तेल के टैंकर फूंक रहे हैं।

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Author: sssrknews

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