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“रोना मत माँ, तू शहीद की माँ है” — बिस्मिल के आखिरी शब्द

राम प्रसाद बिस्मिल को फांसी से एक दिन पहले जेल प्रशासन ने अपनी मां “मूलमती देवी” से मिलने की इजाज़त दी, एक क्रन्तिकारी का अपनी मां के साथ किया गया अन्तिम वार्तालाप इतिहास में अमर हो गया…

18 दिसम्बर 1927 को जब सुबह गोरखपुर जेल का फाटक खुला तो 70 साल की एक बूढ़ी मां, कमर झुकी हुई, आंखें पथराई हुई अंदर आईं, जिसका 30 साल का बेटा राम प्रसाद हथकड़ी-बेड़ियो में जकड़ा खड़ा था, जिसके चेहरे पर तेज एवं आंखों में चमक थी…

मां को देखते ही बिस्मिल ठहाका मारकर हंसे “आ गईं माई? मैंने सोचा था तू नहीं आएगी।”

बेटे को इस हालत में देख मां की आंखों में आंशू भर आये और बोली “बेटा, तुझे इस हाल में… हाय रे मेरा लाल… काश तू फांसी की बजाय…”

बिस्मिल ने बात काट दी। आवाज़ सख्त हो गई “मां, खबरदार जो आंसू बहाए। तू किसी डाकू-चोर की मां नहीं, एक क्रांतिकारी की मां है। अगर तू रोई, तो मेरी आत्मा को शांति नहीं मिलेगी।”

मां ने आंचल से आंसू पोंछे। कांपती आवाज़ में पूछा: “बेटा, आखिरी इच्छा क्या है?”

बिस्मिल मुस्कुराए “मेरी इच्छा? मेरी इच्छा है कि मेरे बाद तू किसी के आगे हाथ न फैलाए। मेरे दोस्त मदद करेंगे। और हां, ये बेड़ी देख रही है? इसे याद रखना। ये गुलामी की निशानी है।”

मां बोलीं: “बेटा, तू तो चला जाएगा… मेरा क्या होगा?”

बिस्मिल का जवाब पत्थर पर लकीर बन गया “मां, माटी का एक बेटा मरेगा तो क्या? तेरे हजारों बेटे अभी जेलों में हैं। मैं तो इसलिए मर रहा हूं ताकि कल को कोई मां अपने बेटे को ‘अंग्रेजों का गुलाम’ न कहे। तू गर्व से सिर उठाकर कहना – ‘मैं शहीद की मां हूं’। रोना मत, वरना अंग्रेज कहेंगे – ‘देखो, क्रांतिकारी की मां रो रही है’।”

मां ने तुरंत आंसू पोंछ लिए, और गम्भीर स्वर में बोलीं: “जा बेटा। भारत माता को पराधीनता की बेड़ियों से मुक्त करा दे, मैं नहीं रोऊंगी।”

बिस्मिल ने झुककर मां के पैर छुए। हथकड़ी की वजह से हाथ नहीं उठे, तो सिर झुकाकर पैरों को माथा लगाय…..

तभी जेलर ने कहा: “टाइम खत्म।”

जाते-जाते मां ने पूछा: “डर तो नहीं लग रहा बेटा?”

बिस्मिल फिर हंसे, “डर? मां, कल सुबह जब मैं ‘वंदे मातरम्’ और ‘भारत माता की जय’ बोलते हुए फांसी के फंदे को चूमूंगा, तो वो डर खुद मुझसे डर जाएगा। तू बस इतना याद रखना – “‘सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है”‘

मां बेटे को देखती रहीं जब तक वो आंखों से ओझल नहीं हो गया और इसके बाद अगली सुबह: 19 दिसंबर 1927 को समय 6:30 बजें आजादी का वो नायक रामप्रसाद बिस्मिल नहा-धोकर, यज्ञोपवीत पहनकर हाथ में गीता लेकर तैयार हो गया…
जल्लाद ने पूछा: “कोई आखिरी इच्छा?”
बिस्मिल बोले: “बस यही कि फंदा मैं खुद गले में डालूं।”
“वंदे मातरम्, भारत माता की जय” बोलते हुए खुद फंदा चूमा और झूल गए..

​जब बिस्मिल शहीद हो गए और उनका पार्थिव शरीर बाहर लाया गया, तो वहां हज़ारों की भीड़ रो रही थी। लेकिन एक महिला ऐसी थी जिसकी आँखों में एक भी आंसू नहीं था। वो थीं मूलमती जी…

​लोग दंग थे, तभी उन्होंने भीड़ के सामने हाथ उठाकर कहा: “मेरा बेटा भारत माता का था, उसने अपना फर्ज निभाया। मुझे गर्व है कि मैंने एक ऐसे बेटे को जन्म दिया जिसने आज़ादी के लिए जान दी। मैं रोऊँगी नहीं, क्योंकि रोना कायरता है!”

​बिस्मिल के जाने के बाद घर की हालत बहुत खराब हो गई, लेकिन इस महान माँ ने कभी अंग्रेजों के सामने हाथ नहीं फैलाए। उन्होंने अपने दूसरे बेटे को भी देश सेवा के लिए तैयार किया और कहा— “एक बेटा गया तो क्या हुआ, अभी एक और बाकी है।”

​बिस्मिल ‘बिस्मिल’ नहीं बनते, अगर उनके पीछे ऐसी माँ का संस्कार न होता।
​आज हम अपने बच्चों को सिर्फ ‘करियर’ सिखाते हैं, मूलमती जी ने ‘बलिदान’ सिखाया था।
​इतिहास ने उन्हें सिर्फ ‘बिस्मिल की माँ’ लिखकर छोड़ दिया, जबकि वो खुद एक महान क्रांतिकारी थीं….

बिस्मिल जाते जाते भी दुनिया को बता गए कि शहादत रोकर नहीं, हंसकर दी जाती है तभी बिस्मिल हंसते-हंसते फांसी चढ़े सके…

रामप्रसाद बिस्मिल की आखिरी नज़्म का एक शेर, जो जेल की दीवार पर लिखा मिला था…
“मालिक तेरी रज़ा रहे और तू ही तू रहे,
बाकी न मैं रहूं न मेरी आरज़ू रहे”

आज भी गोरखपुर जेल में वो कोठरी है, जिसकी दीवारें आज भी पूछती है कि- “क्या तुममें बिस्मिल वाली हंसी बाकी है?”

ऐसे ही लाखों क्रान्तिकारियों की शोर्य गाथाएं जो इतिहास में दबकर रह गई है किन्तु उनके साहस, पराक्रम के कारण ही हम आज स्वतंत्र मुल्क में सांस ले रहे हैं किन्तु उनकी कुर्बानियों को भूलते जा रहे हैं हम स्वार्थी होते जा रहे हैं हमारे मानसिकता इतनी गिर चुकी है कि हम अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए अपने मुल्क के साथ हर पल गद्दारी कर रहे हैं हम छल, कपट, मिलावट, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार में लिप्त हो चुके हैं और अपनी सम्पत्ति जोड़ने में लगे हुए हैं…

आज हमारी यही मानसिकता रही तो शायद वह दिन दूर नहीं जब हम पुनः पराधीन हो चुकें होंगे और आपकी जोड़ी हुई सम्पत्ति पर कोई और ही आसीन हो जाएगा इसलिए आप सभी से विनम्र अनुरोध है कि अपने व्यक्तिगत हितों के लिए राष्ट्र को कमज़ोर मत करो क्योंकि यदि राष्ट्र सुरक्षित है तभी तक हम सुरक्षित है अन्यथा गुलामों का कोई वजूद नहीं होता लेख कटु हो सकता है किन्तु सत्य है कृपया एक बार मनन अवश्य करें।
जय हिन्द 🙏
जय भारत 🙏🙏
नोट- मैंने राष्ट्रवाद एवं अपने स्वतंत्रता सेनानियों के शौर्य पराक्रम एवं लोगों के मन में राष्ट्र भावना को जगाने तथा भारत को एक अखंड मुल्क के रूप में स्थापित करने वाली ओजस्वी कविताएं लिखी हैं यदि आप किसी के सम्पर्क में कोई स्टूडियो हो जो मेरी कविताओं को रिकार्ड कराके अन्य देशवासियों तक पहुंचा सके तो कृपया मेरा सम्पर्क करानें की कृपा करें 🙏 🙏
मेरा मो0नं0 8433210582 है ।

साभार : बृजेन्द्र प्रताप सिंह
मु0आ0, उ0 प्र0 पुलिस
राष्ट्रवादी-ओज कवि
इटावा/कानपुर नगर।

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Author: sssrknews

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