वह उन्नीस सौ नब्बे की बात थी
जब एक शिशु-सूर्य
उसके वक्ष में उतर गया था
और उसकी आँखों से झाँकता था
वह जब बोलती थी
दिशाएँ उच्चारती थीं :
जय श्री राम!
भगवा कपड़ों में वह
गीताप्रेस से छपी
रामचरितमानस के गुटके से कम नहीं लगती थी
जब भी कहीं गोली चलती
जब भी कहीं लाठी पड़ती
कोई न कोई चौपाई
उसके आड़े आ जाती थी
कितने ही श्लोकों ने मिलकर
उस साध्वी के लिए
कर्ण जैसा कवच तैयार किया था
आज चौंतीस / छत्तीस बरस बाद
जब वह शिशु-सूर्य अधेड़ हो चला है
उस साध्वी का मुखमंडल
पूर्णिमा के चंद्र-सा चमकता है
कौन भूल सकता है
कि इस साध्वी ने
दिशाओं को पहाड़ों की तरह रटवाया :
राम एकम राम
राम दूजा राम
राम तीजा राम..
साध्वी!
शपथ पूरी हुई
लहू से सींची हुई धरती
हर्ष के अश्रुओं से सींचने तक आ पहुँची है
अब थोड़ा विश्राम करो देवी!
या तुम्हारा मन
फिर किसी शिशु-सूर्य को
वक्ष में धारण करने का है?
कौन जानता है!
कविता : “साध्वी ऋतंभरा जी के नाम”
(यह कविता दो वर्ष पूर्व राम मंदिर निर्माण के समय लिखी थी)



