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“गायत्री मंत्र: जब विज्ञान रुका, तब चेतना ने रास्ता दिखाया”

मंत्रों में अगर कोई राजा है तो वह गायत्री है, पर राजा तलवार से नहीं, प्रकाश से राज्य करता है।

ये कहानी मेरे नाना पंडित विद्याधर शास्त्री की है, और उस रात की है जब विज्ञान हार गया था और एक पंक्ति ने बिजली पैदा कर दी थी।

1. अविश्वास

2018 की बात है। मैं, अर्णव, IIT कानपुर से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग करके बेंगलुरु में एक स्टार्टअप में काम कर रहा था। नाना काशी में अस्सी घाट के पास रहते थे। वो रोज ब्रह्ममुहूर्त में उठकर गायत्री करते, 108 बार, बिना माला गिने।

मैं हँसता था। “नाना, ये फ्रीक्वेंसी, वाइब्रेशन, सब प्लेसीबो है। ॐ भूर्भुवः स्वः से टरबाइन नहीं चलेगी।”

वो मुस्कुराते। “बेटा, मंत्र राजा इसलिए नहीं कि वो शोर करता है, इसलिए कि वो सुनता है। गायत्री शक्ति नहीं माँगती, बुद्धि को जगाती है। धियो यो नः प्रचोदयात्, हमारी धी को प्रेरित कर। जब बुद्धि जगेगी, शक्ति अपने आप आएगी।”

दिसंबर में नाना को ब्रेन स्ट्रोक आया। डॉक्टरों ने कहा, बायाँ हिस्सा डैमेज है, बोल नहीं पाएँगे, शायद याददाश्त भी नहीं। मैं काशी भागा।

ICU में मशीनें बीप कर रही थीं। नाना की आँखें खुलीं, पर खाली। मैंने उनका हाथ पकड़ा। उन्होंने होंठ हिलाए, आवाज नहीं।

उसी रात उनकी पुरानी डायरी मिली। पहले पन्ने पर लाल स्याही से लिखा था – गायत्री साधना: 1962, चंबल डाकू अभियान।

2. डायरी का राज

डायरी में नाना ने लिखा था, वो 22 साल के थे, तब सेना में सिग्नल कोर में रेडियो ऑपरेटर। 1962 में चंबल के बीहड़ों में एक टुकड़ी फँस गई थी। वायरलेस टूट गया, बैटरी खत्म, रात में डाकुओं ने घेर लिया।

कैप्टन ने कहा, सुबह तक कोई मदद नहीं।

नाना लिखते हैं, “मैं डर से काँप रहा था। तभी मुझे दादा की बात याद आई, गायत्री जप कर। मैंने आँखें बंद कीं। पहले 11 बार तो मन भटका। 12वीं बार पर साँस अपने आप लंबी हुई। ॐ भूः… भुवः… स्वः… हर शब्द के साथ जैसे सीने में कोई ट्यूनिंग फोर्क बजा।”

“21वीं बार पर अजीब हुआ। अंधेरे में मुझे अपने रेडियो सेट के सर्किट का नक्शा साफ दिखा। एक टूटा हुआ कॉइल, जो दिन में नहीं दिखा था। मैंने टॉर्च की बैटरी निकाली, तांबे के तार से बाईपास बनाया। 54वीं बार पर मैंने माइक ऑन किया। आवाज नहीं, पर एक लय थी।”

“108वीं बार खत्म होते ही, जैसे मेरे दिमाग में कोई स्विच ऑन हुआ। मैंने गलत फ्रीक्वेंसी नहीं, सही हार्मोनिक पकड़ी। ‘हेलो बेस, हेलो बेस’… जवाब आया। सुबह हेलीकॉप्टर आया। कैप्टन ने पूछा, तूने ये फ्रीक्वेंसी कैसे निकाली? मैंने कहा, मैंने नहीं, मंत्र ने बताया।”

नीचे लिखा था, गायत्री मंत्र राजा इसलिए है क्योंकि यह माँगता नहीं, रिसीवर साफ करता है।

3. शक्ति का प्रयोग

मैंने ICU में वही किया। डॉक्टरों ने मना किया, पर मैंने नाना के कान के पास धीरे-धीरे जप शुरू किया। मैं नास्तिक था, पर आवाज मेरी थी।

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

पहले दिन कुछ नहीं। दूसरे दिन मैंने देखा, जप करते समय मेरी साँस 6 सेकंड अंदर, 6 सेकंड बाहर अपने आप हो रही थी। मेरा दिमाग, जो हमेशा नोटिफिकेशन में रहता था, एक बिंदु पर टिक गया।

तीसरे दिन रात 3 बजे, 108वें जप पर नाना की उंगली हिली। मॉनिटर पर अल्फा वेव्स बढ़ीं। नर्स भागी आई।

पाँचवें दिन चमत्कार नहीं हुआ, विज्ञान हुआ। नाना ने आँखें खोलीं और फुसफुसाया, “भर्गो…”

डॉक्टर हैरान थे। स्पीच थेरेपी में जो रिकवरी 6 महीने में होती है, वो 3 हफ्ते में दिखी। नाना ने बाद में बताया, “जब तू जप रहा था, मैं अंधेरे में था। फिर एक सूरज जैसा प्रकाश आया, पर गर्म नहीं, ठंडा। उसने मेरे दिमाग के बंद रास्ते दिखा दिए। मैंने उसी प्रकाश को फॉलो किया।”

मैं बेंगलुरु लौटा, पर अब रोज सुबह 4:30 बजे उठता हूँ। स्टार्टअप में हम एक लो-पावर मेडिकल डिवाइस बना रहे थे जो ब्रेन स्ट्रोक पेशेंट्स को ऑडियो फीडबैक देता है। महीनों से हम फ्रीक्वेंसी मैच नहीं कर पा रहे थे।

एक सुबह जप के बाद, ध्यान में मुझे अचानक एक पैटर्न दिखा, 7.83 हर्ट्ज़, शूमन रेजोनेंस, वही लय जो गायत्री के छंद में है, 24 अक्षर, 3 पाद, 8-8-8। मैंने लैब में वही फ्रीक्वेंसी सेट की। डिवाइस पहली बार स्टेबल हुई।

हमारी टीम ने पेटेंट फाइल किया। पेपर में मैंने लिखा, “Cognitive entrainment through rhythmic Vedic chanting.”

4. राजा का अर्थ

पिछले साल नाना गए। जाते-जाते उन्होंने मेरा हाथ पकड़कर सिर्फ इतना कहा, “राजा वो नहीं जो सबसे ज़्यादा मारे, राजा वो है जो सबसे ज़्यादा जगाए।”

अब मैं समझता हूँ गायत्री को मंत्रों का राजा क्यों कहते हैं।

हनुमान चालीसा बल देता है, महामृत्युंजय रक्षा करता है, ॐ नमः शिवाय लय देता है। पर गायत्री कुछ माँगती नहीं। वो तुम्हारे प्रोसेसर को ओवरक्लॉक करती है।

भूः भुवः स्वः – तुम्हारे शरीर, प्राण, मन को एक लाइन में लाता है
तत्सवितुर्वरेण्यं – तुम सूर्य की तरह देखने योग्य तेज को चुनते हो, अंधेरे को नहीं
भर्गो देवस्य धीमहि – तुम उस तेज को धारण करते हो, पीते नहीं, बनते हो
धियो यो नः प्रचोदयात् – और फिर वो तेज तुम्हारी बुद्धि को धक्का देता है, सही दिशा में

ये शक्ति चमत्कार नहीं करती, ये तुम्हें चमत्कार करने लायक बनाती है।

आज भी जब मैं डरता हूँ, या कोड नहीं चलता, या जिंदगी उलझती है, मैं आँख बंद करता हूँ। 108 बार नहीं, कभी-कभी सिर्फ 3 बार। और हर बार वही ठंडा सूरज अंदर जलता है।

नाना की डायरी के आखिरी पन्ने पर लिखा था, “गायत्री सिद्ध नहीं होती, साधक सिद्ध होता है।”

साभार : सोशल मीडिया

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Author: sssrknews

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