संत परंपरा तो छोड़िए सामान्य परंपरा में भी अपने वरिष्ठ के विरूद्ध अभद्र भाषा का प्रयोग करना अपने संस्कारों का अधम प्रदर्शन है। गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर महंथ योगी आदित्यनाथ जी अविमुक्तेश्वरानंद से हर व्यवस्था पद प्रतिष्ठा वय में वरिष्ठ हैं।
शंकराचार्य का पद हिंदू धर्म मे बड़ा महत्वपूर्ण है।आदिगुरु शंकराचार्य जी ने लगभग 788-820 ईस्वी में भारत के चारों दिशाओं में सनातन धर्म, अद्वैत वेदांत के प्रचार-प्रसार और हिंदू धर्म की एकता के लिए चार मठ/पीठों की स्थापना की।
उत्तराम्नाय: ज्योतिर्पीठ (ज्योतिर्मठ), बदरिकाश्रम (जोशीमठ, उत्तराखंड) — महावाक्य: प्रज्ञानं ब्रह्म।
पश्चिमाम्नाय: द्वारका शारदा पीठ (द्वारका, गुजरात) — महावाक्य: तत्त्वमसि।
दक्षिणाम्नाय: शृंगेरी शारदा पीठ (शृंगेरी, कर्नाटक) — महावाक्य: अहं ब्रह्मास्मि।
पूर्वाम्नाय: गोवर्धन पीठ (पुरी, ओडिशा) — महावाक्य: अयमात्मा ब्रह्म।
शंकराचार्यो की पीठ से पुराना इतिहास गोरक्षपीठ का रहा है। उस पीठ के पीठाधीश्वर के खिलाफ किसी संत कहलाने वाले व्यक्ति के अपमानजनक वक्तव्य उनके मानसिक दिवालियापन को दर्शाता है।
गोरक्षपीठ की समाज के लिए अहम भूमिका रही। गुरु गोरखनाथ (11वीं शताब्दी के आसपास) ने हठयोग को व्यवस्थित रूप दिया। उन्होंने गोरक्ष शतक, सिद्ध सिद्धांत पद्धति जैसे ग्रंथों के माध्यम से आसन, प्राणायाम, मुद्रा, बंध और कुंडलिनी जागरण की तकनीकों का प्रचार किया।
गोरक्षनाथ पीठ का इतिहास तो चारों युग में रहा है।
सतयुग में: पेशावर (पंजाब क्षेत्र)
त्रेतायुग में: गोरखपुर (उत्तर प्रदेश)
द्वापर युग में: हरमुज (द्वारिका के पास)
कलियुग में: गोरखमधी (सौराष्ट्र)
नाथ संप्रदाय ने योग को आमजन तक पहुंचाया, जो पहले मुख्यतः ब्राह्मणों या उच्च वर्ग तक सीमित था। इसका हिंदू धर्म में शारीरिक साधना और आध्यात्मिक चेतना में एक क्रांतिकारी योगदान है, जिसने बाद के भक्ति आंदोलन (कबीर, नानक, दादू आदि) को प्रभावित किया।
गोरखनाथ ने जाति-भेद, छुआछूत, ऊँच-नीच, आडंबरों का विरोध किया। नाथ संप्रदाय में सभी वर्गों (यहाँ तक कि अस्पृश्य माने जाने वाले) के लोग शामिल हुए।
गोरक्षपीठ से अनवरत योग-साधना चलती रही, जो भारत भर के नाथ मठों का केंद्र बनी।मध्यकाल में खिलजी, औरंगजेब जैसे आक्रमणों में मंदिर क्षतिग्रस्त हुआ, लेकिन नाथ योगियों ने परंपरा, पूजा-पद्धति और जन-श्रद्धा को जीवित रखा।पीठ ने हिंदू संस्कृति, गो-रक्षा और सनातन आचार-विचार की रक्षा की, जो हिंदू पहचान को बनाए रखने में सहायक रहा।
ब्रिटिश काल में पीठ ने हिंदू धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए संघर्ष किया। महंत दिग्विजयनाथ ने हिंदू महासभा से जुड़कर राष्ट्रवादी आंदोलन को मजबूत किया। महंत अवैद्यनाथ राम जन्मभूमि आंदोलन के प्रमुख नेता थे; वे गो-रक्षा आंदोलन (1966 दिल्ली प्रदर्शन) और अयोध्या आंदोलन में अग्रणी रहे।
पीठ ने हिंदू जागरण, गो-रक्षा, राम मंदिर निर्माण जैसे मुद्दों पर जन-जागरण किया, जो आधुनिक हिंदुत्व और धार्मिक राष्ट्रवाद से जुड़ा।पीठ शिक्षा, स्वास्थ्य, गो-सेवा, जन-सेवा का केंद्र बनी। यहाँ से नाथ परंपरा पूरे भारत (और नेपाल) में फैली।
वर्तमान महंत योगी आदित्यनाथ (उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री) के नेतृत्व में यह राजनीतिक-सामाजिक प्रभाव वाला केंद्र बना, लेकिन इसका मूल योगदान आध्यात्मिक और सांस्कृतिक संरक्षण में है।
संक्षेप में, गोरक्षपीठ ने हिंदू धर्म को योग की क्रांति दी, समाज सुधार से समानता सिखाई, विदेशी आक्रमणों में जीवित रखा और आधुनिक काल में हिंदू एकता और राष्ट्रवाद को मजबूत किया। यह पीठ न केवल एक तीर्थ है, बल्कि हिंदू धर्म की जीवंतता, समावेशिता और प्रतिरोध का प्रतीक बनी हुई है।
मतलब सनातन के लिए हर मामले मे गोरक्षपीठ का इतिहास और पीठाधीश्वरो का संघर्ष ज्यादा रहा है।संतो को साथ लेकर चलने मे ज्यादा योगदान रहा है। समाज सेवा मे ज्यादा योगदान रहा है। योगी के शासन काल ने उत्तर प्रदेश के हिंदू मंदिरो का जीर्णोद्धार हुआ।हिंदू बालिकाओ की सुरक्षा और हिंदूओ की सुरक्षा उनका महत्वपूर्ण कार्य रहा। उन्होने अपनी सियासत से गरीबो का उत्थान किया। उत्तर प्रदेश और देश मे गोरक्षपीठ का नाम रोशन किया। संतो को और हिंदूओ के लिए संघर्ष करना उनकी उपलब्धि है।
ऐसे गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर के लिए अविमुक्तेश्वरानंद के टिप्पणियां देख ऐसे लोगों से घृणा न हो तो क्या हो ??






