नई दिल्ली: भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की अनुमति पाने वाले पहले व्यक्ति हरीश राणा का बुधवार को दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार किया गया। राणा का निधन मंगलवार को एम्स-दिल्ली में हुआ, जहां वह पिछले 13 साल से अधिक समय से कोमा में थे।
क्या है पूरा मामला?
हरीश राणा ने 24 मार्च को शाम 4:10 बजे अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर मिलते ही आसपास के लोग और परिचित उनके परिवार को सांत्वना देने पहुंचे।
हरीश राणा मूल रूप से गाजियाबाद के रहने वाले थे। साल 2013 में चंडीगढ़ में पढ़ाई के दौरान वह अपने हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए थे, जिससे उनके सिर में गंभीर चोट आई। इस हादसे के बाद से वह लगातार अचेत अवस्था में थे और वर्षों तक बिस्तर पर पड़े रहने के कारण उनके शरीर पर घाव भी हो गए थे।
कैसे बिगड़ी हालत?
इस दुर्घटना के बाद हरीश क्वाड्रिप्लेजिया की स्थिति में चले गए थे। यह एक गंभीर अवस्था होती है, जिसमें गर्दन या स्पाइनल कॉर्ड को चोट लगने के कारण व्यक्ति के हाथ-पैर काम करना बंद कर देते हैं। ऐसे मरीज न तो चल-फिर सकते हैं और न ही दैनिक काम खुद कर पाते हैं। शरीर की संवेदनाएं भी काफी हद तक खत्म हो जाती हैं, जिससे लंबे समय तक बिस्तर पर रहने के कारण जटिलताएं बढ़ती जाती हैं।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
गौरतलब है कि 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा के मामले में महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए उन्हें पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी थी। यह भारत में इस तरह का पहला मामला माना जा रहा है, जिसने इच्छामृत्यु को लेकर नई बहस छेड़ दी है।



