मानव जीवन एक अवसर है श्रेष्ठ बनने का, श्रेष्ठ करने का और श्रेष्ठ पाने का।
निश्चय ही मनुष्य जीवन परमात्मा का दिया हुआ एक श्रेष्ठ उपहार है।
यह दुबारा कब मिलेगा इसे कोई नहीं जानता।
इसलिए हमे इसका यत्नपूर्वक होशपूर्ण सदुपयोग करना चाहिए।
मनुष्य जीवन को धर्मग्रंथों मे “सुर दुर्लभ” अर्थात देवताओं के लिए भी अलभ्य कहा गया है।
देवता मानव-जीवन की कामना करते तो हैं पर यह उनके लिए लभ्य नहीं है।
मनुष्य (नर) अपनी साधना ( कर्म) से देव दुर्लभ स्थिति तक पहुंच सकता है जो देवताओं के लिए संभव नहीं ।
मनुष्य जीवन में कांटे तो बहुत हैं, लेकिन सौंदर्य की भी कोई कमी नहीं है।
जीवन को बुरा केवल वे ही लोग कहते हैं, जिनकी दृष्टि फूलों के बजाय कांटों पर ही लगी रहती है।
कांटों पर दृष्टि रहेगी तो इसमें चुभन ही चुभन, पीड़ा ही पीड़ा महसूस होगी, पर फूलों पर दृष्टि रहेगी तो जीवन में सौंदर्य ही सौंदर्य नजर आएगा।
आइए हम इस जीवन को उत्सव बनाएं, संगीत बनाएं, नृत्य बना कर इसे अर्थपूर्ण बनाएं।
इस जीवन में सब कुछ पाया जा सकता है, पर इसके लिए सब कुछ देना भी पड़ेगा। पाने के लिए देना/खोना एक आवश्यक शर्त है।
जो देता है वही पाने का अधिकारी होता है।
मर कर ही, नव जीवन पाया जा सकता है।
इसलिए जीवन को बुरा कहने के बजाय जीवन की बुराई मिटाओ।
यही श्रेष्ठ है और यही कल्याण का एकमात्र मूल मंत्र है।







