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एकादशी व्रत का महत्व और सही तिथि

एकादशी व्रत कैसे रखते हैं व्रत में क्या खाना चाहिए नियम क्या हैं आओ जानें

27 अप्रैल सोमवार क़ो व्रत करें एकादशी व्रत में दशमी की रात से लेकर द्वादशी की सुबह तक सात्विक नियमों का पालन करना होता है। इसमें मुख्य रूप से चावल व अन्न का त्याग, निराहार या फलाहार (दूध,फल, मूंगफली) खाकर भगवान विष्णु की पूजा,मंत्र जाप,और रात्रि जागरण किया जाता है। व्रत का पारण द्वादशी तिथि को शुभ समय पर किया जाता है।

एकादशी व्रत के प्रमुख नियम
तैयारी (दशमी तिथि) दशमी के दिन सूर्यास्त के बाद भोजन न करें। तामसिक भोजन (प्याज,लहसुन,अंडा मांस) पूरी तरह वर्जित है।
एकादशी व्रत विधि
एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और व्रत का संकल्प लें।
वर्जित इस दिन बाल, दाढ़ी या नाखून न काटें। झाड़ू न लगाएं (सूक्ष्म जीवों की हिंसा से बचने के लिए)।
पूजा भगवान विष्णु गोपाल जी के स्वरूप (शालिग्राम) का पंचामृत या जल से अभिषेक करें। ‘ओम नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप करें।
भोजन में फलाहार लें और अन्न का पूरी तरह त्याग करें। फलाहार में फल,सिघाड़े के आटे की पूड़ी पकौड़े दही,दूध,पनीर पकौड़े काली मिर्च सेंधा नमक और मूंगफली ले सकते हैं। खाएं फल, दूध, दही, साबूदाना, कुट्टू या सिंघाड़े का आटा, आलू, मूंगफली। निर्जला एकादशी पर पानी भी नहीं पिया जाता।
रात में जागरण करें और कीर्तन करें।
पारण (द्वादशी तिथि)
व्रत अगले दिन (द्वादशी) सूर्योदय के बाद और हरि वासर (द्वादशी की शुरुआत के कुछ घंटे) बीतने के बाद ही खोलना चाहिए।
पारण के समय सात्विक भोजन ग्रहण करें।
क्या खाएं और क्या न खाएं?
न खाएं चावल, गेहूं, जौ, दालें (विशेषकर मसूर दाल), प्याज, लहसुन, शहद।

राधा रानी की उपासना का महत्व
अज्ञान और अंधकार को मिटाने के लिए श्री राधा रानी के चरणों का आश्रय लेना अनिवार्य है । उनके बिना प्रभु का शुद्ध प्रेम प्राप्त करना कठिन है।
भक्ति में दैन्य और अभिमान शून्यता: सर्वोत्तम भक्ति वही है जिसमें साधक पूरी तरह से अभिमान-शून्य और दीन भाव (दैन्य) से युक्त हो। जब भक्त ऐसा होता है, तो भगवान स्वयं उसके अधीन हो जाते हैं ।
उपास्य देव में दृढ़ लगाव: साधक को अपने इष्ट के सिवा किसी अन्य वस्तु या व्यक्ति में लगाव नहीं रखना चाहिए। सांसारिक लगाव भक्ति में बाधा डालता है ।
वृंदावन की महिमा: वृंदावन में रहने और श्री जी के चरणों का आश्रय लेने वाले भक्त का अंतिम समय मंगलमय होता है, क्योंकि किशोरी जी की सखियां स्वयं आकर नाम स्मरण कराती हैं ।
प्रारब्ध और स्वीकार्यता: सुख-दुख प्रारब्ध के अनुसार आते हैं, इन्हें बदलने का प्रयास करने के बजाय भगवान के चिंतन में रहना चाहिए। ‘होनी’ को कोई नहीं टाल सकता, इसलिए व्यर्थ की चिंताओं को छोड़कर अपना मन ईश्वर में लगाएं ।
निष्कर्ष: जीवन का लक्ष्य सांसारिक झंझटों में समय नष्ट करना नहीं, बल्कि नाम जप (राधा-राधा) और भगवत स्मरण के माध्यम से इसी जन्म में प्रभु को प्राप्त करना है ।

ब्रजभूमि किसे कहते हैं
‘ब्रज’ शब्द प्राचीन है। हालांकि ‘ब्रज’ शब्द का व्यवहार भिन्न-भिन्न कालों में बदलता रहा है। ‘ब्रज’ शब्द का प्रथम प्रयोग ‘ऋग्वेद’ संहिता में मिलता है, जिसका अर्थ है-गौवंशों के समूह से घिरी धरती-‘गाव उष्णामिव ब्रजं’। ‘हरिवंश पुराण’ और ‘श्रीमद्भागवत’ आदि पौराणिक साहित्यों में भी ‘ब्रज’ शब्द का वर्णन मिलता है-‘तद् ब्रजस्थानमधिकम् शुशुभे कानकावृतम्’। वाराह, मत्स्य पुराण में तो ब्रज की सीमाओं तक का वर्णन है।

ब्रज मंडल की सीमाओं के सम्बंध में एक दोहा बहुत प्रसिद्ध है-
इत बरहद, इत सोनहद, उत सूरसेन को गांव।
ब्रज चौरासी कोस में, मथुरा मंडल मांह।
अर्थात् ब्रजमंडल के एक ओर हद ‘वर’ स्थान है, दूसरी ओर सोन नदी और तीसरी ओर सूरसेन का गांव है। ‘बर’ अलीगढ़ जिले का बरहद ही है। सोननदी की हद गुड़गांव जिले तक जाती है और सूरसेन का गांव यमुना के किनारे पर बसा हुआ आगरा का बटेश्वर गांव ही है।

श्री नारायण भट गोस्वामी जी ने ‘ब्रज विलास’ ग्रंथ में लिखा है-‘पूर्व हास्यवनीय पश्चिमस्यो पहारिकं। दक्षिणे जहनु संनाकं भुवनाख्यं तथोत्तरे।
‘सूरसारावली’ में ‘सूरदास’ ने ब्रजभूमि की सीमा इस प्रकार बतायी है-
‘चौरासी ब्रज कोस निरंतर खेलत हैं बल मोहन।
सामवेद, ऋग्वेद यजुर में कहेउ चरित ब्रजमोहन।

ब्रज शब्द को लेकर स्कंद पुराण में भी लिखा है-‘ब्रजन्ति गावो यस्मिन्निति ब्रजः’। जिस स्थान पर नित्य गायें चरती हैं, उस स्थान को ‘ब्रज’ कहते हैं।

श्रीमद् भागवत में जब ‘शुकदेव’ से राजा परीक्षित पूछते हैं।
‘कस्मान्मुकुन्दों भगवान् पितुर्गेहाद् ब्रजं गतः।- भगवान मुकुंद किस कारण पिता के घर से ब्रज में गए ? और ब्रज वसन्किम करोन्मधुपुर्या च केशवः।

प्राप्त ग्रंथों आधार पर इतना को स्पष्ट है कि मथुरा, आगरा, अलीगढ़, हाथरस, बुलंदशहर, एटा, मैनपुरी, बदायूं, बरेली, हरियाणा का गुरूग्राम, राजस्थान के भरतपुर, धौलपुर, करौली और ग्वालियर का पश्चिमी भाग ब्रज में शामिल है। यदि कन्नौजी को स्वतंत्र बोली ना माना जाए, तो पीलीभीत, शाहजहांपुर, फर्रूखाबाद, हरदोई, इटावा और कानपुर के जिले भी ब्रजमंडल में सम्मिलित हो जाते।
राग ‘मारू बिहाग’—ताल त्रिताल में एक पद देखिए।
ऊधो, मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं।
बृंदावन गोकुल तन आवत सघन तृनन की छाहीं॥
प्रात समय माता जसुमति अरु नंद देखि सुख पावत।
माखन रोटी दह्यो सजायौ अति हित साथ खवावत॥
गोपी ग्वाल बाल संग खेलत सब दिन हंसत सिरात।
सूरदास, धनि धनि ब्रजबासी जिनसों हंसत ब्रजनाथ॥

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Author: sssrknews

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