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पंचशील समझौता, तिब्बत और भारत-चीन संबंध: क्या 1954 की कूटनीतिक भूल आज भी देश भुगत रहा है?

गुस्से से बिफरते हुए कांग्रेस के अध्यक्ष और गांधी जी के बहुत करीबी आचार्य कृपलानी ने कहा ये पाप का समझौता एक दिन इस देश को बहुत भारी पड़ेगा….

1950 में चीन द्वारा कब्जा किए जाने से पहले तिब्बत एक स्वतंत्र राष्ट्र था… पंचशील समझौते के बाद भारत और चीन सीधे पड़ोसी बन गए और तिब्बत एक बफर स्टेट के रूप में समाप्त हो गया…

पर 1950 से पहले भारत का तिब्बत में गहरा प्रभाव था,एक तरह से केंद्र शासित प्रदेश के जैसा लेकिन इस समझौते पर हस्ताक्षर करके भारत ने अपने प्रभाव को ऐसा समाप्त कर दिया कि उसकी तपिश आज तक अरूणाचल से लेकर लद्दाख तक महसूस होती है…

1954 का पंचशील समझौता को स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक भूलों में से एक माना जाता है…यह समझौता तिब्बत के लिए बेहद महत्वपूर्ण था और वो भारत की तरफ आस लगाए बैठा था क्योंकि साथ ही भारत चीन सीमा लगी थी…उसे भरोसा था कि भारत के अपने पक्ष में दवाब बढ़ाने पर तिब्बत की स्वायत्तता भी बरकरार रहेगी पर ये समझौता ऐसा हुआ कि अक्साई चीन की स्पष्ट सीमारेखा की समस्या भी अनसुलझी रह गई…नतीजा कुछ सालो बाद भारत चीन की लड़ाई और एक बड़े भूभाग के समर्पण के रूप में सामने आया… सेना के हजारों जवानों की कुर्बानी व्यर्थ चली गई….

पर ये सारी शुरुआत 1950 में बीजिंग में भारत के कार्यवाहक राजदूत पत्रिलोकी नाथ कौल साहब थे और तिब्बत को लेकर भारत-चीन समझौते के प्रमुख वार्ताकारों में से एक थे…

उन्ही के बनाए समझौते के क्लाज आगे चलकर 1954 के पंचशील समझौते का आधार बने.. त्रिलोकी नाथ कौल कोई साधारण व्यक्ति नही थे ,वे तब भारत के सबसे प्रसिद्ध राजनयिकों में गिना जाता है। अमेरिका,रसिया और चीन के राजदूत वो जवाहर लाल नेहरू के कार्यकाल में रह चुके थे और नेहरू जी से लेकर इंदिरा जी तक उनपर अंधविश्वास रखते थे…

1954 में उन्हें भारत-चीन सीमा विवाद और तिब्बत के भविष्य को लेकर होने वाली वार्ताओं के लिए चीन भेजा गया था..कहा जाता है कि वहाँ वे एक चीनी महिला के हनी ट्रैप में फँस गए….जबकि भारत में उनकी पत्नी और बच्चे पहले से मौजूद थे…पर कौल साहब यही नही रूके शर्मनाक बात यह थी कि उन्होंने उस चीनी महिला से शादी करने की अनुमति तक माँग ली थी..

इतना ही नहीं, उन्होंने उस महिला के साथ हनीमून मनाने के लिए दो महीने की छुट्टी भी माँगी थी सरकार से झूठ बोलकर और यह सब तब हुआ जब भारत चीन के बीच इतनी महत्वपूर्ण वार्ताएँ चल रही थीं..

जब को इस पूरे मामले की जानकारी नेहरू जी को मिली, तो उन्होंने तुरंत कौल को भारत वापस बुला लिया… चीनी महिला के प्रेम में पागल
कौल ने सरकार के आदेश को नजरंदाज कर दिया और चार सप्ताह बाद चीन से लौटे….

जरा सोचिए, उस दौर में प्रधानमंत्री के आदेश को भी इस तरह टाला जा सकता था,कितनी पावरफुल पकड़ थी उनकी प्रधानमंत्री कार्यालय में….

किसी भी और सामान्य लोकतांत्रिक देश में ऐसे कृत्य के लिए किसी भी डेप्लोमेट पर कड़ी कार्रवाई होती, लेकिन हमारे देश में ऐसा नहीं हुआ…

कौल न केवल डेप्लोमेट बने रहे, बल्कि बाद में उन्हें अमेरिका और सोवियत संघ जैसे महत्वपूर्ण देशों में राजदूत बनाने के अलावा भी अहम जिम्मेदारियाँ दी गईं… उन दिनों उनका कौल सरनेम होना भी काफी मददगार साबित हुआ…मेनन और कौल बस तब सरनेम नही थे,खुद में एक सरकार थे…

1954 की भारत चीन वार्ताएँ सीमा विवाद का समाधान नहीं निकाल सकीं… नेहरू जी ने लगभग चीन के सामने सरेंडर करते हुए तिब्बत के मुद्दे को स्वीकार कर लिया और भारतीय सेना ने अपनी कई स्ट्रेटजीक बढ़त खो दीं….

कौल की इस चीनी वार्ता में भूमिका और हनी ट्रैप के कारण हुई संभावित क्षति का पूरा सच कभी सार्वजनिक नहीं हुआ, लेकिन उस दौर के कुछ देशभक्त डेफ्लोमेट्स ने अपनी किताबों में इन सभी घटनाओं का उल्लेख किया है…

वरना शायद हमें कभी पता ही नहीं चलता कि 1954 की उन विनाशकारी वार्ताओं के दौरान वास्तव में क्या हुआ था…1962 का भारत-चीन युद्ध भी इन्हीं असफलताओं का परिणाम माना जाता है…

आज राहुल जी दिन रात नरेंदर सेरेंडर की माला जपते रहते है,जबकि अभी भारत सतत अपनी स्ट्रेटजिक बढ़त बनाने के लिए अपने देश की सीमाओं को सुरक्षित करने में लगा हुआ है…

हम असल में कब कब सेरेंडर हुए थे ,ये इस कहानियों से पता चलता है कभी पंचशील की कहानी,कभी ताशकंद समझौता तो कभी शिमला समझौता..

इस तरह की महत्वपूर्ण राजनयिक वार्ताओं में हर देश के पास कुछ बर्गेनिंग चिप्स होते हैं और कुछ ऐसी सीमाएँ होती हैं जहाँ तक वह समझौता करने को दोनो देश तैयार रहते है.. लेकिन दूसरी तरफ को आपकी अंतिम सीमा का अंदाजा हो जाए, तो यह उसके लिए बड़ा रणनीतिक लाभ बन जाता है….
इसीलिए हर डिप्लोमेट या नेता के लिए अपनी निजी कमजोरियों पर नियंत्रण रखना बेहद आवश्यक होता है….

कौल साहब की नीजी कमजोरी ने पंचशील की नींव डाली,ताशकंद शास्त्री जी की मौत और हाजी पीर से पुरा हुआ .. शिमला समझौता कारगिल में मौजूद एक प्वाइंट और हमारे 83 जवानों पर सेरेंडर हुए…

सोच कर देखो तो खून खौल जाता है…और ये राहुल गांधी जैसे लोग देश हित की बात करते है जबकि इन्हे देश कब्जे के लिए चाहिए ,सेवा के लिए नही.. ये मैं नही कह रही हूं आचार्य कृपलानी जी का ही एक प्रसिद्ध कथन है कि कांग्रेस ने देश को आजादी में योगदान दिया लेकिन सत्ता ने कांग्रेस को ही बदल दिया…

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Author: sssrknews

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