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“स्फटिक शिवलिंग, कुलदेवी पूजा और कल्पवास: आध्यात्मिक उन्नति व सुख-समृद्धि का मार्ग”

स्फटिक शिवलिंग और कुलदेवी की पूजा-अर्चना का विशेष महत्व क्या होता है आओ जानें

इस शिवलिंग की अपने घर में पूजा, प्रतिष्ठा करके नित्य गंगाजल अथवा पंचामृत से अभिषेक करके चंदन, पुष्प, विल्वपत्र आदि से पूजन करने से भगवान शिव की विशेष अनुकंपा प्राप्त होती है।

इनकी अनुकंपा से आयु, आरोग्यता, धन, संपत्ति, यश, मान, प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है।

स्फटिक को हीरे का उपरत्न कहा जाता है। स्फटिक को कांचमणि, बिल्लोर, बर्फ का पत्थर तथा अंग्रेजी में रॉक क्रिस्टल कहते हैं। यह एक पारदर्शी रत्न है।

स्फटिक बर्फ के पहाड़ों पर बर्फ के नीचे टुकड़े के रूप में पाया जाता है।
इसे शीत वीर्य मणि माना गया है।
यह बर्फ के समान पारदर्शी और सफेद होता है।

स्फटिक शिवलिंग भी सकारात्मक ऊर्जा से भरा होता है। यह शिवलिंग घर से हर प्रकार की नकारात्मकता को दूर करता है।

जिस घर में यह शिवलिंग स्थापित कर दिया जाता है वहाँ सभी प्रकार के रोगों का नाश होता है।

पूरे सावन के महीने में सोमवार को एवं महाशिवरात्रि आदि दिनों में इसका नियमित रूप से पूजा एवं अभिषेक करने से घर से कई तरह के वास्तुदोष दूर होते हैं।

जिस घर में ये शिवलिंग स्थापित करके एक महीने तक नियमित रूप से पंचामृत द्वारा अभिषेक किया जाता है , वहां धन का अभाव नहीं रहता तथा आरोग्य रहता है।

इसके प्रभाव से शिक्षा मे उन्नति होगी, प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता मिलती है।

जो भी व्यक्ति इसे स्थापित करता है उसके जीवन में नाम ,पैसा ,प्रसिद्धि सब कुछ प्राप्त होता है।

स्फटिक का 5 अंगुल से लेकर 11 अंगुल तक का शिवलिंग शुभ माना गया है।

” ॐ ह्रौं वं शिवाय सशक्तिकाय नम: ”
अभिषेक के पश्चात उक्त मंत्र का जप करें।

ध्यान मे रखने योग्य बात है –
“ मृत्तिका भूतो वा लिंगम हिम खंडं प्रति भूयताम. नाभिषेको कान्चंरूपम रजत नवनीतम खलु ”

अर्थात सफ़ेद पत्थर के शिवलिंग पर सिन्दूर,स्फटिक के शिवलिंग पर घी,
काले पत्थर अर्थात ग्रेनाईट के शिवलिंग पर हल्दी और अष्ट धातु के शिव लिंग पर लाल नहीं चढ़ाना चाहिए।

घर में करें स्फटिक शिवलिंग की स्थापना, होगी सुख-समृद्धि,वास्तु विज्ञान में बताया गया है कि हमारे आस-पास और घर में मौजूद चीजों का किसी न किसी रुप में हम पर जरुर असर होता है। इसलिए हमें घर के लिए बताई वास्तु से संबंधित बातों का ध्यान रखना चाहिए ताकि हमारा जीवन सुखमय हो सके।

घर के मुख्य द्वार पर बैठे हुए गणपति की दो मूर्तियां इस प्रकार लगाएं कि दोनों की पीठ एक-दूसरे से सट जाए। इससे घर में ऋद्धि-सिद्धि का वास होगा। सत्यनारायण की पूजा, व्रत और पाठ करवाएं। “ऊं नमो भगवते वासुदेवाय” का पाठ करें। इससे लक्ष्मी का स्थायी निवास होगा।

11 सफेद एवं सुगंधित पुष्प लेकर चौराहे के मध्य में प्रात: काल सूर्य के उगने से पूर्व रख दें तो ऐसे व्यक्ति को अकस्मात धन लाभ होने की संभावना बनती है।

परिवार की महिला शुक्रवार को वैभव लक्ष्मी का व्रत करे और दान करें। इससे घर में सुख-समृद्धि और खुशहाली आती है।

रद्दी या बेकार का कबाड़ शनिवार के दिन बेचने से घर की दरिद्रता दूर होती है।

दक्षिणावर्ती शंख की स्थापना अपने पूजा घर में करें। यह लक्ष्मी का स्वरूप है। इससे लक्ष्मी प्रसन्न रहती हैं। इससे घर में सुख-समृद्धि का वास होता है।

गुरुवार के दिन घर में कभी भी पोचा न लगाएं।

संध्या के बाद कचरा बाहर न फैंके। शाम होने से पहले सूखे कपड़े जो खुली जगह में सुखाने के लिए डाले हैं उन्हें अवश्य उठाकर समेट लें।

बैंक की किताब, चैक बुक, धन आदि जिस अलमारी में रखें, उस अलमारी का मुंह उत्तर दिशा की ओर होना अच्छा माना जाता है।

अपने गृह-मंदिर में पारदर्शी स्फटिक शिवलिंग की स्थापना करें। यह सुख-समृद्धि लाता है।

चींटियों को शक्कर में मिला आटा खिलाएं।

संध्या होने से पूर्व घर में लक्ष्मी जी के चित्र के सामने घी का दीपक जलाकर उनकी पूजा करें।

घर से किसी भी शुभ काम के लिए निकलें तो थोड़ा-सा दही खा लें।

धन संबंधी कोई भी कार्य सोमवार और बुधवार को करें।

घर में श्रीयंत्र, कुबेर यंत्र, एकमुखी रुद्राक्ष की स्थापना भी लक्ष्मी आगमन का द्योतक है।

घर में तुलसी, काला धतूरा, सफेद आक, त्रिधारी मोर एवं केले का पौधा लगाना समृद्धिदायक है।

!! ॐ नमः शिवाय !

कल्पवास के 21 नियम क्या हैं, क्या कुंभ के बिना भी कर सकते हैं

कल्पवास एक कठोर साधना है, जिसके शास्त्रों में अद्भुत लाभ बताए गए हैं. सामान्य अर्थ में कह सकते हैं कि ‘कल्पवास’ व्यक्ति के लिए आध्यात्मिक विकास, मोक्ष और पुण्य प्राप्ति का जरिया है.*

महाकुंभ धर्म और आस्था का अनूठा संगम है. महाकुंभ के दौरान त्रिवेणी संगम पर साधु-संत, संन्यासी, भक्त और श्रद्धालु आस्था की डुबकी लगाते हैं. साथ ही इस समय कई लोग कल्पवास भी करते हैं. मान्यता है की कुंभ में किए कल्पवास का महत्व कई गुना बढ़ जाता है. लेकिन क्या कुंभ के अलावा भी कल्पवास किया जा सकता है? आइये जानते हैं.

क्या होता है कल्पवास?
कल्पवास मनुष्य के लिए आध्यात्मिक विकास का जरिया है. पुण्य फल प्राप्त करने की साधना को ही कल्पवास कहते हैं. महाभारत के अनुसार कल्पवास 100 साल तक बिना अन्य ग्रहण किए तपस्या करने जैसा पुण्य फल देता है. निष्ठापूर्वक कल्पवास करने से इच्छित फल की प्राप्ति होती है और व्यक्ति को जन्म जन्मांतर के बंधनों से मुक्ति मिलती है. कल्पवास के दौरान नियमित रूप से सूर्य उपासना, भगवान विष्णु, शिव और देवी के मंत्रों का जाप करना होता है. कल्पवास के दौरान भागवत गीता, रामायण जैसे धार्मिक ग्रंथों का पाठ करना, भजन कीर्तन करना, साधना और सत्संग करना होता है. साथ ही कल्पवास के दौरान क्रोध, लालच, अहंकार, हिंसा आदि से दूर रहना चाहिए.

कौन कर सकता है कल्पवास
कल्पवास करने के लिए उम्र की कोई बाध्यता नहीं होती है. किसी भी उम्र का व्यक्ति कल्पवास के नियमों का पालन कर सकता है. लेकिन विशेष रूप से जो व्यक्ति सांसारिक मोह माया से मुक्त होकर अपनी जिम्मेदारियां को पूरा कर चुके हैं उनके लिए कल्पवास उपयुक्त माना जाता है. इसका कारण यह है कि जिम्मेदारियों में बंधा व्यक्ति अपने आत्म पर नियंत्रण नहीं रख पाता, जबकि कल्पवास शरीर और अंतःकरण दोनों के कायाकल्प का माध्यम है.

कुंभ के अलावा कर सकते हैं कल्पवास?
कल्पवास आध्यात्मिक शुद्धि और मोक्ष के लिए किया जाता है. इसलिए इसे कुंभ के अलावा भी किया जा सकता है. लेकिन कुंभ के दौरान किए कल्पवास का महत्व कई गुणा बढ़ जाता है. महाभारत के अनुसार, माघ में किया कल्पवास उतना ही पुण्य माना जाता है, जितना 100 वर्षों तक बिना अन्न ग्रहण किए तपस्या करना. आप अपनी दिनचर्या से अवकाश लेकर भी कल्पवास के नियमों का पालन कर सकते हैं. इससे आपको शारीरिक और मानसिक रूप से ताजगी और ऊर्जा का अनुभव होगा. कल्पवास 3 दिन, 7 दिन, 15 दिन, 30 दिन, 45 दिन, तीन महीने, छह महीने, छह साल, बारह साल या जीवनभर भी किया जा सकता है.

कल्पवास के 21 नियम क्या हैं?
पद्म पुराण में महर्षि दत्तात्रेय ने कल्पवास के 21 नियमों के बारे में बताया हैं. कल्पवास धारण करने वालों को इन नियमों का पालन जरूर करना चाहिए.

1. सत्य वचन:- कल्पवास के दौरान सत्य बोलने का पालन।

2. अहिंसा :- किसी तरह के हिंसा से दूरी बनाना।

3. इंद्रियों पर नियंत्रण:- इंद्रियों को संयमित रखना।

4. प्राणियों पर दया भाव:- पृथ्वी पर रहने वाले सभी प्राणियों के प्रति दया दृष्टि का भाव रखना।

5. ब्रह्मचर्य:- संयमित जीवन और ब्रह्मचर्य का पूर्ण रूप से पालन करना।

6. व्यसनों का त्याग:- सिगरेट-शराब जैसे नशीले पर्दाशों का पूरी तरह से त्याग करना।

7. ब्रह्म मुहूर्त में जागना:- सुबह सूर्योदय से पूर्व उठ जाना।

8. स्नान:- नियमित तीन बार पवित्र नदी में स्नान करना।

9. त्रिकाल संध्या ध्यान:- सुबह, दोपहर और शाम तीनों समय प्रार्थना और ध्यान करना।

10. पिंडदान:- पूर्वजों का स्मरण करते हुए पिंडदान और तर्पण करना।

11. अंतर्मुखी जप:- मन और आत्मा से ध्यान और मंत्रजाप करना।

12. सत्संग:- साधु-संतों के सानिध्य में रहना।

13. संकल्पित क्षेत्र से बाहर न जाना।

14. किसी की भी निंदा ना करना।

*15. साधु-संन्यासियों की सेवा करना।

16. दान: अन्न, धन और वस्त्र का दान करना।

17. जप और संकीर्तन:- नियमित रूप से भजन, मंत्र और कीर्तन के माध्यम से ईश्वर का स्मरण करना।

18. भोजन:- कल्वास के दौरान केवल एक समय ही भोजन करना चाहिए।

19. भूमि शयन:- भूमि पर सोना।

20. यज्ञ आदि के लिए अग्नि का प्रयोग न करना।

21. देव पूजन:- भगवान की पूजा-आराधना करना।

कल्पवास के इन 21 नियमों में ब्रह्मचर्य,व्रत,उपवास,देव पूजन,सत्संग और दान को सबसे अधिक महत्वपूर्ण बताया गया है

कुलदेवी की कृपा परिवार की सुख-समृद्धि और रक्षा का आधार

हमारी संस्कृति में कुलदेवी या कुलदेवता का स्थान सर्वोच्च माना गया है। वे हमारे कुल के रक्षक होते हैं और उनकी प्रसन्नता से ही परिवार में सुख, शांति और वंश की वृद्धि होती है। कई बार जानकारी के अभाव में हम उनकी समुचित पूजा नहीं कर पाते।
यहाँ शास्त्रों और परंपराओं पर आधारित कुछ सरल उपाय दिए गए हैं, जिनसे आप अपनी कुलदेवी को प्रसन्न कर उनका आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं:
1. नित्य स्मरण और भोग
शास्त्रों के अनुसार, कुलदेवी की कृपा पाने के लिए रोजाना सुबह और शाम उन्हें भोग अवश्य लगाएँ। भोग के समय उनके नाम का उच्चारण करें। यदि आपको उनका विशिष्ट नाम नहीं पता है, तो जिस स्थान पर उनका मुख्य मंदिर है, उस स्थान का नाम लेकर उनका स्मरण करें।
2. यदि कुलदेवी ज्ञात न हों
यह एक सामान्य समस्या है। यदि किसी को अपनी कुलदेवी के बारे में कोई जानकारी नहीं है, तो वे निराश न हों। ‘माँ दुर्गा’ को ही अपनी कुलदेवी का स्वरूप मानकर, उनका स्मरण करते हुए पूजा-अर्चना करें। जगतजननी सबकी पुकार सुनती हैं।
3. पवित्रता और प्रकाश
कुलदेवी की पूजा करते समय पवित्रता का विशेष ध्यान रखें। उनके समक्ष शुद्ध देसी घी का दीपक जलाएं। साथ ही, धूप और कपूर अवश्य प्रज्वलित करें, इससे नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।
4. प्रिय भोग और अर्पण
पूजा के समय माँ को प्रसन्न करने के लिए उन्हें पान का बीड़ा अर्पित करें। इस पान में सुपारी, लौंग, इलायची, थोड़ा सा गुलकंद और दक्षिणा रखकर प्रेमपूर्वक चढ़ाएं।
5. विशेष कृपा और क्षमा याचना का उपाय
यदि संभव हो, तो कुलदेवी के मूल स्थान (मंदिर) पर जाएं। वहाँ एक साबुत नींबू को अपने ऊपर से 21 बार उतार (वार) लें। इसके बाद नींबू के दो भाग करके उन्हें दो अलग-अलग दिशाओं में फेंक दें। तत्पश्चात, माँ से जाने-अनजाने में हुई भूलों के लिए क्षमा मांगें और पूजा करें।
6. प्रतीकात्मक स्वरूप
यदि आपके घर में कुलदेवी की तस्वीर या मूर्ति नहीं है, तो एक साबुत सुपारी लें और उस पर अच्छी तरह से लाल कलावा (मौली) लपेट दें। इसे ही कुलदेवी का प्रतीकात्मक रूप मानकर श्रद्धापूर्वक पूजा करें। इससे भी पूर्ण लाभ मिलता है।
सार: कुलदेवी की पूजा में आडंबर से अधिक ‘श्रद्धा और भाव’ का महत्व है। सच्चे मन से उन्हें पुकारें, वे आपके परिवार की रक्षा अवश्य करेंगी।
।। जय माँ कुलदेवी ।। ।। जय माता दी ।।
यह महत्वपूर्ण जानकारी अपने परिजनों और मित्रों के साथ अवश्य शेयर करें, ताकि वे भी अपनी कुलदेवी की कृपा के पात्र बन सकें।

शास्त्रों में कन्यादान को गोदान भूमिदान से भी श्रेष्ठ कहा गया है।इससे पितृऋण और ऋषिऋण से मुक्ति का मार्ग बनता है।कन्या को संस्कारऔर सम्मान के साथ विदा करना—ईश्वर सेवा के समान है

यह पुण्य सात पीढ़ियों तक फल देता है।
जिन परिवारों में पितृदोष या बार-बार बाधाएँ आती हैं, वहाँ कन्यादान से पूर्वज प्रसन्न होते हैं और आशीर्वाद मिलता है।
त्याग और करुणा का संस्कार कन्यादान माता-पिता के अहंकार को गलाकर उन्हें करुणा और वैराग्य की ओर ले जाता है।
ईश्वर के निकटता का अनुभव विवाह में कन्या को लक्ष्मी स्वरूप और वर को नारायण स्वरूप मानकर दान किया जाता है—यह सीधे भगवत् स्मरण का कर्म बन जाता है।
सामूहिक विवाह में भाग लेने के सहस्र गुना पुण्यजहाँ एक साथ कई कन्याओं का विवाह होता है, वहाँ एक नहीं, अनेक कन्यादानों का फल मिलता है।सामूहिक विवाह एक निष्काम सेवा का श्रेष्ठ उदाहरण बिना नाम-यश, बिना दिखावे के सेवा—यही सच्ची भक्ति (निष्काम कर्मयोग) है।समाज कल्याण से आत्मशुद्धि होती है और निर्धन, असहाय परिवारों की सहायता से चित्त शुद्ध होता है और कर्मों का बोझ हल्का होता है।
सामूहिक विवाह में “मेरा–तेरा” भाव टूटता है जिससे अहंकार गलता है और विनम्रता आती है।
गृहस्थ आश्रम का मूल उद्देश्य है—दान, सेवा और धर्म की वृद्धि सामूहिक विवाह इसमें सीधा योगदान देता है।
संतों का सार वचन :-जिस घर से कन्या सम्मान सहित विदा होती है,उस घर में देवता स्वयं निवास करते हैं।”
संक्षेप में कन्यादान → व्यक्तिगत व पारिवारिक मोक्ष मार्ग
सामूहिक विवाह → समाजिक सेवा + अनेक गुना पुण्य
दोनों मिलकर → जीवन का श्रेष्ठ संस्कार।

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Author: sssrknews

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