राजनीति के गलियारों में चर्चा है कि राहुल गांधी ने वह कर दिखाया है जो शायद ही कोई शत्रु कर पाता। उन्होंने विपक्ष के लिए वह ‘टाइम बम’ तैयार किया है, जिसकी सुई 2026 के परिसिमन पर टिकी हुई है
दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने कहा था कि शत्रु जब संधि का हाथ बढ़ाए तो पहले उसके पीछे छिपे ‘परिणाम’ को देखो। अमित शाह ने जब ‘50% सीट वृद्धि’ का प्रस्ताव दिया, तो वह एक राजनैतिक संधि थी।
लेकिन यहाँ विपक्ष के पास शकुनि जैसी बुद्धि तो थी, पर दृष्टि धृतराष्ट्र वाली।
शकुनि (अमित शाह) ने पासे फेंकते हुए कहा—”भांजे, ये 50% सीटें ले लो, वरना 2026 में अनुच्छेद 81 का ‘वज्र’ गिरेगा।” पर दुर्योधन (विपक्ष) की जिद थी कि “सुई की नोंक के बराबर श्रेय भी मोदी को नहीं दूंगा।”
रामायण की चौपाई सटीक बैठती है:
“बिनय न मानत जलधि जड़, गए तीनि दिन बीति।
बोले राम सकोप तब, भय बिनु होइ न प्रीति॥”
विपक्ष ने जब विनय (प्रस्ताव) नहीं माना, तो अब 2026 में ‘संवैधानिक कोप’ तय है।
भीष्म पितामह की तरह विपक्ष के पुराने नेता (अखिलेश, डीएमके, टीएमसी) जानते थे कि अनर्थ हो रहा है, पर वे ‘राहुल-मोह’ की जंजीरों में बंधे रहे।
मुंशी प्रेमचंद के शब्दों में कहें तो, विपक्ष ने इस बिल के विरोध में जो उत्साह दिखाया, वह उस ‘घीसू और माधव’ जैसा है जो कफ़न के पैसों से पूरियाँ खाकर खुश हो रहे हैं, यह भूलकर कि आगे का भविष्य अंधकारमय है।
प्रेमचंद के व्यंग्य के लहजे में: “विपक्ष को लगा कि उन्होंने सरकार को घेर लिया, पर असल में उन्होंने अपनी ही राजनैतिक विरासत के दरवाजे पर कुंडी लगा दी है।”
महर्षि वेदव्यास ने महाभारत में लिखा है कि जब विनाश काल आता है, तो व्यक्ति का विवेक सबसे पहले मर जाता है। महर्षि वाल्मीकि ने जिस प्रकार करुणा से ‘मा निषाद’ कहा था, आज देश का मतदाता विपक्ष को देखकर कह रहा है—”मा मूर्खता!”
अनुच्छेद 81 का वह जिन्न जब 2026 में बाहर आएगा, तब कोई ‘स्टे’ काम नहीं आएगा। दक्षिण के राज्यों का प्रभाव कम होगा और उत्तर-मध्य भारत की सीटों का सैलाब आएगा। तब राहुल गांधी वैसे ही विलाप करेंगे जैसे रावण वध के बाद शूर्पणखा ने किया था।
विपक्ष की हालत आज हरिवंश राय बच्चन जी की ‘मधुशाला’ जैसी है, जहाँ उन्हें अहंकार का नशा तो है, पर राह भूल गए हैं:
“मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवाला,
‘किस पथ से जाऊँ’ असमंजस में है वह भोलाभाला!”
विपक्ष को लगा कि वे ‘विरोध’ के रास्ते पर चल रहे हैं, पर वे तो अमित शाह के बनाए ‘वन-वे’ पर निकल गए जहाँ से वापसी का कोई यू-टर्न नहीं है।
वहीं गुलज़ार साहब के अंदाज में कहें तो:
“हाथ तो मिलाया था मगर लकीरें अपनी-अपनी थीं,
हमने तो सिर्फ बिल फाड़ा, उन्होंने हमारा मुस्तकबिल (भविष्य) ही फाड़ दिया।”
2026 में जब पाबंदी हटेगी, तब अमित शाह वही प्रस्ताव (50% वृद्धि) लेकर नहीं आएंगे। तब वह सीधे अनुच्छेद 81 का डंडा चलाएंगे। जनसंख्या के आधार पर सीटें बढ़ेंगी। उत्तर भारत में ‘सीटों की बरसात’ होगी और विपक्ष के ‘क्षेत्रीय क्षत्रप’ सूखे में खड़े रह जाएंगे।
तब सदन में अमित शाह दहाड़ेंगे:
“हम ही ने लिखे थे फसाने तुम्हारे,
आज हम ही तुम्हें आईना दिखाएंगे!”
विपक्ष आज तालियां बजा रहा है, पर यह तालियां वैसी ही हैं जैसी किसी ‘कॉमेडी शो’ के अंत में बजती हैं। अमित शाह ने एक शानदार शतरंज की बिसात बिछाई, जिसमें विपक्ष ने अपने ‘राजा’ को बचाने के चक्कर में पूरी ‘सेना’ ही कुर्बान कर दी।
“हित अनहित नहिं जानहीं, बालक सम सब कोय।
अहंकार बस मति फिरी, अब जो होइ सो होय॥”
विपक्ष ने खुद ही अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारी है, और अब उस कुल्हाड़ी पर ‘महिला आरक्षण’ का लेबल चिपका दिया है। मोदी और देश के लिए इससे सुखद क्या होगा कि विपक्ष खुद अपनी ‘राजनैतिक बलि’ देने के लिए उतावला है!
क्या आपको लगता है कि विपक्ष के पास अब कोई ‘बैकअप प्लान’ बचा है, या फिर यह पूरी तरह ‘अंतिम संस्कार’ की तैयारी है?
साभार: सोशल मीडिया
“जय जय सियाराम”
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