मेरा एक दोस्त था .. राजीव पँवार, जाट था!
मित्रमंडली में सब उसे “भूरा” कह के बुलाते थे।
जवानी थी तो थोड़ा गुस्सा जल्दी आ जाता था उसको.. गुस्से में बड़ा खतरनाक लगता था, हल्की हल्की दाढ़ी रखता था।
आज अचानक से उसकी याद आ गई !
निशात में हकला खान की “डर” मूवी लगी थी, हम दोनों सिटी बस में बैठ कर हापुड़ अड्डे से निशात सिनेमा हाल आबू लेन के लिए निकले.. सिटी बस में थोड़ी भीड़ थी उन दिनों आमतौर पर छात्रों का स्टाफ चला करता था सिटी बस में ।
टिबू पंडत की सिटी बस थी वो उस जमाने में 1 रुपया किराया लगता था .. खैर भीड़ में मैं आगे खड़ा था और भूरा थोड़ा पीछे, मैंने भूरा को कहा की पैसे मैं दे दूंगा .. भूरा मुझे रोकते हुए बोला अबे नहीं स्टाफ चल जाएगा तू घबरा मत, जब कंडेकटर पैसे मांगे तो उसको पीछे भेज देना।
मैंने ऐसा ही किया, अब कंडक्टर भूरा के पास पहुंचा और पैसे मांगे।
भूरा – (दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए) बोला “स्टाफ” , कंडक्टर ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा और फिर बोला “पैसे निकाल”
भूरा – रै टिकट ना लिया करते हम .. !, कंडक्टर ने उसके कंधे पर हाथ रखा और फिर बोला “पैसे निकाल – कोई स्टाफ विस्टाफ़ ना चलता यहाँ”
भूरा – रै तेरे को बताया ना .. टिकट ना लिया करते हम !
कंडक्टर थोड़ा पीछे हटा और एक घुमा कर रहपट भूरा के कान पे रसीद करते हुए बोला “पैसे निकाल”
भूरा ने मेरी ओर देखा और गाल मलते हुए बोला .. “लाला इसको पैसे दे दे” !
अब भूरा का एक दूसरा कांड सुनिए
हमारे पुराने मुहल्ले देवी नगर के पास सूरज कुंड रोड पर एक है “दत्ता स्पोर्ट्स” दत्ता हर दो भाई हैं अब मुझे उनके नाम तो ध्यान नहीं पर हम उन्हे दत्ता कह कर ही बुलाते थे ।
भूरा हनुमान पूरी में रहता था और दिन का अधिकतर समय मेरी दुकान पर आ जाया करता था।
दत्ता, भूरा, सोनू, गौरव हम सब अक्सर शाम को साथ ही हुआ करते थे।
देसी कट्टे, तमंचे, 315, 9 mm इस प्रकार की गॉसिप बड़ी आम थी।
एक बार किसी बात को लेकर छोटे दत्ता और भूरा की बहस हो गई, बहस इतनी बढ़ी कि हाथापाई भी हो गई जिसमें छोटा दत्ता भूरा पर हावी रहा।
देखते ही देखते दो गुट तैयार हो गए, कुछ दिन तक सुबह शाम की गहमागहमी कट्टे तमंचे चलाने की प्लानिंग होने लगी।
मैं हमेशा की तरह मध्यस्थ था दोनों पक्षों को लेकर शांत रहता था मेरा मानना था कि बेफालतू की बातों पर आपसी टकराव ठीक नहीं है।
मैने जैसे तैसे दत्ता को शांत रहने और मामले को निपटाने के लिए मना लिया।
यह तय हुआ कि अमुक शाम को भूरा और उसके गुट के साथी समझौता करने के लिए आएंगे।
अमुक शाम आई एक तरफ छोटा दत्ता खड़ा था तो दूसरी तरफ भूरा, मैंने दोनों को हाथ मिलाने एवं समझौता करने के लिए हाथ बढ़ाने को बोला, मेरी बात सुनकर दत्ता ने अपना हाथ बढ़ाया ….
दत्ता से बुरी तरह पिट चुका भूरा अपने चिर परिचित अंदाज में अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरता हुआ बोला “रै समझौता ऐसे नहीं होगा, दत्ता को माफी मांगनी पड़ेगी”
दत्ता जो मेरे कहने से सब कुछ भूलने को तैयार था, बिफर गया और बोला “अबे ओ जाट माफी गई भाड़ में, मैं सिर्फ लाला के कहने पर समझौते के लिए राजी हुआ हूं”
बात फिर बढ़ गई और दत्ता ने भूरे के कान पे एक जोरदार थप्पड़ रसीद कर दिया।
मैंने रोका और बात संभालने का प्रयास किया।
भूरा एक बार फिर कान पे हाथ रखे लगभग मिमियाता सा बोला 🥹लाला इसे बोल ये बस एक बार सॉरी बोल दे।
भूरा की फर्जी बदमासी से त्रस्त मुझसे रहा न गया, मैं उसको बोला “साले जब गांव में गूदा नहीं है तो तू लकड़ी लेता क्यों है” 🫤🫤
ये डोलांड ट्रंप मुझे बार बार भूरा की याद दिलाता है।
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