Home » ताजा खबर » 108 दानों की माला का रहस्य और महादेव पर धतूरा-बेलपत्र चढ़ाने का वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक महत्व

108 दानों की माला का रहस्य और महादेव पर धतूरा-बेलपत्र चढ़ाने का वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक महत्व

भजन(सुमिरन)करने वाली माला में108 दाने क्यों होते हैं एवं महादेव पर धतूरा और बेलपत्र चढ़ाने का असली रहस्य क्या यह केवल श्रद्धा है या विज्ञान आओ जानें

अंक शास्त्र के अनुसार मूलांक अर्थात 1 से लेकर 9 तक के अंक नवग्रहों के प्रतीक हैं।
और शून्य (0) प्रतीक है निर्गुण निराकार ब्रह्म का और 1 अंक उस ईश्वर का जो दिखाई तो त्रिदेवों के रूप में देता है लेकिन वास्तव में वह एक ही है। नाम-रूप का भेद कार्य-भेद से है,
8 अंक में पूरी प्रकृति समाहित हैं। यथा-
भूमिरापोनलोवायु: रवं मनोबुद्धि रेव च।अहंकार इतीयं से भिन्नाप्रकृतिरष्टधा।।
अर्थात पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार यह मेरी 8 प्रकार की प्रकृति है।
108 की संख्या के पीछे यह रहस्य है कि इसके द्वारा जीव सांसारिक वस्तुओं की प्राप्त, ईश्वर के दर्शन और ब्रह्म तत्व की अनुभूति-जो भी चाहे, कर सकता है।
हमारी सांसों की संख्या के आधार पर 108 दानों की माला स्वीकृत की गई है। 24 घंटों में एक व्यक्ति 21600 बार सांस लेता है। यदि 12 घंटे दिनचर्या में निकल जाते हैं तो शेष 12 घंटे देव-आराधाना में लिए बचते हैं। अर्थात 10800 सांसों का उपयोग अपने इष्टदेव के स्मरण के लिए करना चाहिए। लेकिन इतना समय देना हर किसी के लिए संभव नहीं होता। इसलिए इस संख्या में से अंतिम दो शून्य हटाकर शेष 108 सांस में ही प्रभु स्मरण की मान्यता प्रदान की गई है। एक अन्य मान्यता के अनुसार,एक वर्ष में सूर्य 216000 (दो लाख सोलह हजार) कलाएं बदलता है। सूर्य हर छह महीने में उत्तरायण और दक्षिणायण रहता है। इस प्रकार छह महीने में सूर्य की कुल कलाएं 108000 (एक लाख आठ हजार) होती हैं। अंतिम तीन शून्य हटाने पर 108 संख्या मिलती है, इसलिए माला जप में 108 दाने सूर्य की एक-एक कलाओं के प्रतीक हैं।
तीसरी मान्यता के अनुसार, ज्योतिष शास्त्र इन्हें 12 राशियों और 9 ग्रहों से जोडता है। 12 राशियों और 9 ग्रहों का गुणनफल 108 आता है अर्थात 108 अंक संपूर्ण जगत की गति का प्रतिनिधित्व करता है।
चौथी मान्यता भारतीय ऋषियों द्वारा 27 नक्षत्रों की खोज पर आधारित है। प्रत्येक नक्षत्र में चार चरण होते हैं, अत: इनके गुणनफल की संख्या 108 आती है जो परम पवित्र मानी जाती है। संतों तथा महान पुरूषों के नाम के पूर्व 108 अंक का प्रयोग यह भी संकेत देता है कि वे प्रकृति, ईश्वर एवं ब्रह्म के संबंध में परोक्ष और अपरोक्ष ज्ञान वाले हैं।

हमारे ऋषि मुनि पूज्यनीय क्यों हैं

अंगिरा:- ऋग्वेद के प्रसिद्ध ऋषि अंगिरा ब्रह्मा के पुत्र थे। उनके पुत्र बृहस्पति देवताओं के गुरु थे। ऋग्वेद के अनुसार, ऋषि अंगिरा ने सर्वप्रथम अग्नि उत्पन्न की थी।

विश्वामित्र:- गायत्री मंत्र का ज्ञान देने वाले विश्वामित्र वेदमंत्रों के सर्वप्रथम द्रष्टा माने जाते हैं। आयुर्वेदाचार्य सुश्रुत इनके पुत्र थे। विश्वामित्र की परंपरा पर चलने वाले ऋषियों ने उनके नाम को धारण किया। यह परंपरा अन्य ऋषियों के साथ भी चलती रही।

वशिष्ठ:- ऋग्वेद के मंत्रद्रष्टा और गायत्री मंत्र के महान साधक वशिष्ठ सप्तऋषियों में से एक थे। उनकी पत्नी अरुंधती वैदिक कर्मो में उनकी सहभागी थीं।

कश्यप:- मारीच ऋषि के पुत्र और आर्य नरेश दक्ष की १३ कन्याओं के पति थे। स्कंद पुराण के केदारखंड के अनुसार, इनसे देव, असुर और नागों की उत्पत्ति हुई।

यमदग्नि:- भृगुपुत्र यमदग्नि ने गोवंश की रक्षा पर ऋग्वेद के १६ मंत्रों की रचना की है। केदारखंड के अनुसार, वे आयुर्वेद और चिकित्साशास्त्र के भी विद्वान थे।

अत्रि:- सप्तर्षियों में एक ऋषि अत्रि ऋग्वेद के पांचवें मंडल के अधिकांश सूत्रों के ऋषि थे। वे चंद्रवंश के प्रवर्तक थे। महर्षि अत्रि आयुर्वेद के आचार्य भी थे।

अपाला:- अत्रि एवं अनुसुइया के द्वारा अपाला एवं पुनर्वसु का जन्म हुआ। अपाला द्वारा ऋग्वेद के सूक्त की रचना की गई। पुनर्वसु भी आयुर्वेद के प्रसिद्ध आचार्य हुए।

नर और नारायण:- ऋग्वेद के मंत्र द्रष्टा ये ऋषि धर्म और मातामूर्ति देवी के पुत्र थे। नर और नारायण दोनों भागवत धर्म तथा नारायण धर्म के मूल प्रवर्तक थे।

पराशर:- ऋषि वशिष्ठ के पुत्र पराशर कहलाए, जो पिता के साथ हिमालय में वेदमंत्रों के द्रष्टा बने। ये महर्षि व्यास के पिता थे।

भारद्वाज:- बृहस्पति के पुत्र भारद्वाज ने ‘यंत्र सर्वस्व’ नामक ग्रंथ की रचना की थी, जिसमें विमानों के निर्माण, प्रयोग एवं संचालन के संबंध में विस्तारपूर्वक वर्णन है। ये आयुर्वेद के ऋषि थे तथा धन्वंतरि इनके शिष्य थे।

महादेव पर धतूरा और बेलपत्र चढ़ाने का असली रहस्य क्या यह केवल श्रद्धा है या विज्ञान
​ हम सब जानते हैं कि समुद्र मंथन के दौरान जब विष निकला, तो महादेव ने उसे अपने कंठ में धारण किया। लेकिन क्या आप जानते हैं कि धतूरा और बेलपत्र उसी समय से क्यों चढ़ाए जा रहे हैं?

​1. धतूरा: ‘हलाहल’ के प्रभाव को शांत करने वाला औषधि

आयुर्वेद के अनुसार, धतूरा एक अत्यंत ‘उष्ण’ (गर्म) और विषैला पौधा है। जब महादेव ने कालकूट विष पिया, तो उनके शरीर का तापमान बहुत अधिक बढ़ गया था। विष की उस भयंकर जलन और गर्मी को कम करने के लिए देवताओं ने उन पर ऐसी औषधियां चढ़ानी शुरू कीं जो ‘विष को मार सकें’। धतूरा अपनी विषैली प्रकृति के कारण उस हलाहल विष के असर को ‘न्यूट्रलाइज’ (बेअसर) करने में सहायक हुआ।

​2. बेलपत्र: परम शीतलता का प्रतीक

बेलपत्र का स्वभाव बहुत ही शीतल होता है। जब महादेव का मस्तक विष की अग्नि से जल रहा था, तब बेलपत्र ने उन्हें ठंडक प्रदान की। यही कारण है कि आज भी हम शिवलिंग पर जल और बेलपत्र चढ़ाते हैं, ताकि उस ‘ताप’ को शांत रखा जा सके।

​3. एक आध्यात्मिक रहस्य जो कम ही लोग जानते हैं:

धतूरा एक नशीला और कड़वा फल है। इसे चढ़ाने का सांकेतिक अर्थ यह है कि इंसान को अपने मन की ‘कड़वाहट’, ‘नशा’ (अहंकार) और ‘बुराइयों’ को महादेव के चरणों में त्याग देना चाहिए। महादेव वह सब कुछ स्वीकार कर लेते हैं जिसे दुनिया ठुकरा देती है।

​4. शिवलिंग की आकृति और ऊर्जा:

वैज्ञानिक रूप से देखें तो शिवलिंग एक ‘कॉस्मिक जनरेटर’ (Cosmic Generator) की तरह काम करता है। धतूरा और बेलपत्र जैसे औषधीय तत्व जब शिवलिंग के संपर्क में आते हैं, तो वहां की ऊर्जा और भी शुद्ध और शक्तिशाली हो जाती है।

​निष्कर्ष:

सनातन धर्म में कुछ भी बिना कारण के नहीं है। धतूरा और बेलपत्र चढ़ाना इस बात का प्रतीक है कि प्रकृति की हर चीज़, चाहे वह कितनी भी कड़वी या जहरीली क्यों न हो, महादेव के सानिध्य में कल्याणकारी बन जाती है।

sssrknews
Author: sssrknews

इस खबर पर अपनी प्रतिक्रिया जारी करें

Leave a Comment

Share This