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भैंस बेचकर पढ़ाया… बेटे ने करोड़ों लोगों की प्यास बुझा दी

बिहार के समस्तीपुर जिले के रोसड़ा गाँव में 1998 की बाढ़ वाली रात जब मिट्टी का घर आधा डूब गया था, तब रामसुभग पासवान की झोपड़ी में एक लड़का पैदा हुआ। दाई ने कहा, लड़का है। रामसुभग ने छत से टपकते पानी में ही माथा टेका। नाम रखा मनीष।

रामसुभग खेतिहर मजदूर, दिन के अस्सी रुपये। माँ सुनीता दूसरों के घर बर्तन। घर दो कमरे, एक में भैंस, एक में हम चार लोग। मनीष, उसकी बड़ी बहन, माँ बाप।

बचपन याद है तो भूख। स्कूल में मिड डे मील के लिए जाता। किताबें पुरानी, फटी। बिजली नहीं, लालटेन में पढ़ता। बारिश में छत चूती, तो किताब को पन्नी में लपेटता।

पाँचवीं में मास्टर ने पूछा, बड़ा हो कर क्या बनेगा। सबने कहा, पुलिस, फौजी। मनीष ने कहा, आविष्कारक। मास्टर हँसे, पहले चप्पल तो ले आ।

मनीष के पास चप्पल नहीं थी। वह नंगे पैर तीन किलोमीटर स्कूल जाता। रास्ते में कूड़े से टूटी रेडियो, मोटर उठा लाता। घर में खोलता, जोड़ता। माँ डाँटती, कबाड़ मत ला। वह कहता, इसमें बिजली है।

आठवीं में गाँव में पहली बार कंप्यूटर आया, ब्लॉक ऑफिस में। मनीष देखने गया। ऑपरेटर ने भगाया। वह रोज़ खिड़की से देखता। एक दिन ऑपरेटर ने दया कर के माउस पकड़ाया। मनीष ने पेंट में घर बनाया। उसी दिन तय किया, दुनिया बदलनी है।

दसवीं में 92 प्रतिशत आए। पूरे जिले में अखबार में नाम। हेडमास्टर ने कहा, साइंस ले। फीस कहाँ से। रामसुभग ने भैंस बेच दी। माँ ने मंगलसूत्र गिरवी रखा। मनीष रोया। बाप ने कहा, तू पढ़, हम देख लेंगे।

ग्यारहवीं में वह पटना गया, सरकारी कोचिंग। एक कमरे में छह लड़के। वह रात को लाइब्रेरी में पढ़ता, दिन में ट्यूशन पढ़ाता, पचास रुपये घंटा। खाना एक टाइम।

उसी साल गाँव में हैजा फैला। तालाब का पानी पीने से। उसकी बहन भी बीमार। अस्पताल दूर, पैसे नहीं। बहन बच गई, पर तीन बच्चे मर गए। मनीष ने तालाब देखा, गंदा, हरा। उसने सोचा, अगर पानी साफ हो जाए तो।

वहीं से सवाल जन्मा।

बारहवीं में उसने आईआईटी की तैयारी की। किताबें सेकंड हैंड, नोट्स माँगे हुए। 2016 में रिजल्ट आया, रैंक 1,247। आईआईटी खड़गपुर, मैकेनिकल। गाँव में पहली बार कोई आईआईटी गया। डीएम आए, मिठाई बाँटी। रामसुभग की आँखों में आँसू, बोला, अब भैंस खरीदेंगे।

हॉस्टल में मनीष को पहली बार लगा वह गरीब है। लड़कों के लैपटॉप, जूते। उसके पास एक बैग। वह चुप रहता, पढ़ता। पहले सेमेस्टर में टॉप किया। प्रोफेसर ने पूछा, क्या करना चाहते हो। उसने कहा, सस्ता वॉटर प्यूरिफायर। सब हँसे।

दूसरे साल उसने लैब में काम शुरू किया। पुराने वॉटर फिल्टर महंगे, बिजली चाहिए, मेंटेनेंस। गाँव में बिजली नहीं। उसने सोचा, मिट्टी, धूप, कुछ ऐसा।

तीसरे साल उसने मिट्टी के घड़े, सिल्वर नैनो पार्टिकल, और सोलर हीट का मॉडल बनाया। एक घड़ा जो बिना बिजली के पानी को 99 प्रतिशत साफ करे, कीमत दो सौ रुपये। प्रोफेसर ने कहा, इम्पॉसिबल। उसने रात भर टेस्ट किए।

चौथे साल फंड नहीं मिला। उसने कॉलेज फेस्ट में मॉडल दिखाया। एक एनजीओ वाले ने देखा। दस हजार दिए। मनीष ने गाँव जाकर पहला प्रोटोटाइप लगाया। तालाब का पानी डाला, नीचे साफ पानी। गाँव वाले पहले डरे, फिर पिया। कोई बीमार नहीं हुआ।

डिग्री के बाद उसे बेंगलुरु में जॉब ऑफर, बीस लाख पैकेज। माँ ने कहा, ले ले। उसने मना किया। कहा, मैं कंपनी बनाऊँगा। दोस्तों ने कहा, पागल है।

उसने खड़गपुर में ही इनक्यूबेशन लिया। नाम रखा, नीर। दो दोस्त जुड़े। उन्होंने घड़े को और बेहतर किया। मिट्टी लोकल, सिल्वर कोटिंग कम, धूप से चार्ज होने वाला यूवी ढक्कन। कीमत 199 रुपये। एक घड़ा एक परिवार के लिए साल भर।

पहले साल पाँच हजार घड़े बेचे, बिहार ओडिशा में। नुकसान। दूसरे साल एक वीडियो वायरल हुआ। एक बच्ची कह रही थी, पहले पेट दुखता था, अब नहीं। रतन टाटा ट्रस्ट ने नोटिस लिया। फंड मिला, पाँच करोड़।

मनीष ने फैक्ट्री नहीं लगाई। उसने मॉडल बदला। गाँव की औरतों को ट्रेनिंग दी, घड़े बनाना। मिट्टी फ्री, भट्ठा कम्युनिटी का। हर घड़े पर बनाने वाली का नाम। इससे रोजगार भी, पानी भी।

2023 तक दस लाख घड़े। 2024 में अफ्रीका से कॉल आया, केन्या। वही समस्या। मनीष गया। वहाँ भी औरतों को सिखाया। डिज़ाइन ओपन सोर्स कर दिया। कहा, पेटेंट नहीं, पानी सबका।

दुनिया बदलनी शुरू हुई। डब्ल्यूएचओ ने रिपोर्ट दी, नीर घड़े से डायरिया केस 40 प्रतिशत घटे। यूनिसेफ ने पार्टनरशिप की। 2025 में मनीष को मैग्सेसे अवार्ड मिला। स्टेज पर वह फटी चप्पल वाली फोटो दिखा कर बोला, मैं गरीब था, इसलिए अमीर सॉल्यूशन नहीं बना पाया। मुझे सस्ता बनाना पड़ा।

आज 2026 में, मनीष अट्ठाईस साल का है। उसकी कंपनी का वैल्यूएशन नहीं, इम्पैक्ट है। पचास देशों में तीन करोड़ लोग उसका घड़ा इस्तेमाल करते हैं। उसने खुद के लिए कुछ नहीं लिया। वही पुराना कुर्ता। माँ के लिए पक्का घर बनवाया, रोसड़ा में। बाप अब भी खेत जाता है, कहता है आदत है।

पिछले महीने वह गाँव के स्कूल गया। वही स्कूल जहाँ मिड डे मील खाता था। बच्चों ने पूछा, सर आपने दुनिया कैसे बदली। उसने कहा, मैंने नहीं बदली। मैंने सिर्फ पानी साफ किया। दुनिया तुम बदलोगे, जब तुम याद रखोगे कि गरीबी कमी नहीं, लैब है। जहाँ हर प्रॉब्लम सामने दिखती है।

उसने बच्चों को एक घड़ा दिया। कहा, इसे खोलो। अंदर कुछ नहीं, मिट्टी। बोला, दुनिया बदलने के लिए रॉकेट नहीं चाहिए, मिट्टी चाहिए, और जिद।

शाम को वह तालाब किनारे गया, जहाँ बहन बीमार हुई थी। अब वहाँ नीर के घड़े लाइन से रखे थे। औरतें पानी भर रही थीं। एक बच्ची दौड़ कर आई, बोली, भैया पानी पियोगे। उसने पिया। वही स्वाद, मिट्टी का, बचपन का।

रात को माँ ने पूछा, थकता नहीं। उसने कहा, माँ, जिस दिन थकूँगा, उस दिन याद करूँगा कि मैं उस घर में पैदा हुआ था जो बाढ़ में आधा डूबा था। अगर मैं तैर कर बाहर आ सकता हूँ, तो दुनिया भी तैर सकती है।

मनीष पासवान, गरीब परिवार का लड़का, जिसने आईआईटी की डिग्री को नौकरी नहीं, हथियार बनाया। जिसने पेटेंट को तिजोरी नहीं, नदी बनाया। आज उसकी वजह से स्कूलों में बच्चे पेट दर्द से नहीं मरते, औरतें मीलों पानी नहीं ढोतीं, गाँव में डॉक्टर कम आते हैं।

दुनिया बदलना बड़ी बात लगती है। मनीष कहता है, दुनिया बड़ी नहीं, प्यास बड़ी है। प्यास बुझा दो, दुनिया खुद बदल जाएगी।

और रोसड़ा गाँव में आज भी जब कोई बच्चा नंगे पैर स्कूल जाता है, लोग कहते हैं, देखो, अगला मनीष जा रहा है। क्योंकि एक गरीब बच्चे ने साबित कर दिया, मेहनत से सिर्फ किस्मत नहीं, पूरी दुनिया बदली जा सकती है।

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Author: sssrknews

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