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सुप्रीम कोर्ट ने कहा—न्यायपालिका राज्यपाल के अधिकारों का स्थानापन्न नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को राष्ट्रपति और राज्यपाल के लिए विधेयकों पर मंजूरी की समयसीमा तय करने संबंधी मामले में बड़ा फैसला सुनाया। सीजेआई डी.वाई. चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने कहा कि अदालत न तो राज्यपाल की भूमिका अपने हाथ में ले सकती है और न ही उनके या राष्ट्रपति के लिए समयसीमा निर्धारित कर सकती है।

पीठ ने माना कि अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल केवल तीन विकल्पों में से किसी एक को चुन सकते हैं—विधेयक को मंजूरी देना, उसे रोककर वापस भेजना या राष्ट्रपति के पास रेफर करना। चौथा विकल्प संविधान में मौजूद नहीं है। हालांकि कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्यपाल अनिश्चित काल तक किसी विधेयक को लंबित नहीं रख सकते, लेकिन समयसीमा तय करना न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र के बाहर है और शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के खिलाफ है।

तमिलनाडु मामले में हस्तक्षेप असंवैधानिक
सुप्रीम कोर्ट ने दो जजों की उस पीठ के आदेश को असंवैधानिक करार दिया, जिसमें लंबित विधेयकों को ‘मान्य स्वीकृति’ प्रदान कर दी गई थी। संविधान पीठ ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 142 का उपयोग कर न्यायालय राज्यपाल या राष्ट्रपति के अधिकारों का अधिग्रहण नहीं कर सकता।

समयसीमा संविधान के लचीलेपन के खिलाफ—SC
सीजेआई ने कहा कि संविधान ने राज्यपाल और राष्ट्रपति को निर्णय में लचीलेपन का अधिकार दिया है। ऐसे में अदालत द्वारा समयसीमा थोपी जाना संविधान की भावना और शक्तियों के पृथक्करण के विरुद्ध होगा। मान्य सहमति (deemed assent) की अवधारणा भी इसी वजह से अस्वीकार्य है क्योंकि इससे न्यायालय किसी अन्य प्राधिकारी की भूमिका निभाने लगता है।

न्यायिक समीक्षा कब संभव?
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विधेयक कानून बनने के बाद ही उसकी न्यायिक समीक्षा या जांच संभव है। राष्ट्रपति को हर विधेयक पर अनुच्छेद 143 के तहत सुप्रीम कोर्ट से सलाह लेने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन वह चाहें तो यह विकल्प हमेशा उपलब्ध है।

संविधान पीठ ने अंत में कहा कि न्यायपालिका राज्यपाल और राष्ट्रपति की संवैधानिक शक्तियों का अधिग्रहण नहीं कर सकती और न ही उनके निर्णय के लिए समयसीमा निर्धारित कर सकती है।

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Author: sssrknews

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