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जब भगवान बने भक्त के बेटे: दास की अर्थी उठाने आए जगन्नाथ और बलराम

॥ॐ॥
पूरी के पास एक छोटे से गांव में एक गरीब की लाश पड़ी है। लेकिन कोई भी उसकी अर्थी को कंधा देने नहीं आ रहा। लेकिन तभी दो रहस्यमय नौजवान लड़के एक सांवला और एक गोरा अचानक वहां आते हैं और आगे बढ़कर उस अर्थी को अपने कंधों पर उठा लेते हैं। गांव वाले दूर खड़े हैरान है और सबसे बड़ी बात उन अनजान लड़कों के शरीर से पूरी मंदिर के पवित्र चंदन, तुलसी और कपूर की तेज महक क्यों आ रही है? आखिर कौन है यह दोनों और एक अछूत की अर्थी उठाने यह कहां से आए हैं?

आइए देखते हैं इस रुला देने वाली कथा के पहले भाग में।
कहानी शुरू होती है एक बेहद गरीब भक्त से जिसका नाम था दास। दास समाज की नज़रों में एक नीची जाति का अछूत इंसान था। उसके पास ना तो धन था ना पहनने को अच्छे कपड़े। लेकिन उसके पास एक ऐसी दौलत थी जो बड़े-बड़े सेठों के पास भी नहीं थी और वह थी जगन्नाथ जी की अटूट भक्ति। दास के दिन की शुरुआत जय जगन्नाथ से होती और रात भी उसी नाम के साथ। लेकिन उसकी जाति छोटी होने के कारण उसे कभी मंदिर के अंदर जाने की आज्ञा नहीं मिली। वो रोज मीलों पैदल चलकर पूरी आता। मंदिर के सिंह द्वार के बाहर खड़ा होता और दूर से ही मंदिर के शिखर पर लगे नील चक्र को देखकर आंसुओं से रोता हुआ वापस लौट जाता। दास कहता था मेरे कालिया ठाकुर मुझे अंदर नहीं बुलाते तो क्या हुआ? वो वहीं से मेरा प्रणाम स्वीकार कर लेते हैं। दिन बीतते गए। दास बूढ़ा हो गया और एक दिन अचानक एक भयानक बीमारी से दास की मौत हो गई। उसकी टूटी हुई झोपड़ी में सन्नाटा छा गया। उसकी बूढ़ी पत्नी अकेले लाश के पास बैठकर दहाड़े मार मार कर रो रही थी। पत्नी रोते हुए गांव के सरपंच और बड़े पंडितों के पास गई। उसने हाथ जोड़कर उनके पैरों में गिरकर भीख मांगी कि मेरे पति की अर्थी उठवा दो मालिक। घर में कोई आदमी नहीं है। इन्हें श्मशान तक पहुंचा दो वरना इनकी आत्मा भटकती रहेगी। लेकिन गांव वालों का दिल पत्थर का था। सरपंच ने उसे धक्का देकर कहा, दूर हट अछूत। तेरा पति नीची जाति का था। हम उसकी लाश को कंधा देकर अपना धर्म और अपना शरीर अपवित्र नहीं करेंगे। पड़ी रहने दे उसकी लाश को वहीं झोपड़ी में चील कौवों के लिए। बेचारी बूढ़ी औरत टूट गई। शाम होने वाली थी। सूरज ढल रहा था। गांव का एक भी आदमी उस अर्थी को उठाने नहीं आया। औरत वापस झोपड़ी में आई। उसने अपने पति की लाश देखी और रोते-रोते उसकी नजर पूरी मंदिर की दिशा में गई। उसने आसमान की तरफ हाथ उठाए और चीख कर कहा। हे कालिया ठाकुर मेरे पति ने जिंदगी भर तेरे नाम की माला जपी। उसे दुनिया ने दुत्कारा लेकिन उसने कभी तुझे नहीं छोड़ा और आज उसके अंतिम सफर में उसे कंधा देने वाला कोई नहीं। क्या यही सिला दिया तूने उसकी सच्ची भक्ति का? अगर तू सच में है तो भेज किसी को मेरे पति की अर्थी उठाने के लिए। उस औरत के गर्म आंसू अभी जमीन पर गिरे ही थे कि अचानक झोपड़ी के बाहर किसी के कदमों की आहट हुई। घुंघरूओं की हल्की-हल्की झंकार सुनाई दी। औरत ने मुड़कर दरवाजे की तरफ देखा वहां दो बेहद ही सुंदर और नौजवान लड़के खड़े थे। एक का रंग एकदम सांवला था और दूसरे का रंग एकदम गोरा। उन्होंने पीले और नीले रंग के रेशमी कपड़े पहने हुए थे और उनकी झोपड़ी में कदम रखते ही वहां की बदबू गायब हो गई। और पूरी झोपड़ी पारिजात के फूलों और चंदन की खुशबू से महक उठी। उनके कपड़े किसी राजा महाराजा जैसे थे। औरत ने कांपते हुए हाथ जोड़कर पूछा, “कौन-कौन हो बेटा? इतने सुंदर और इतने अमीर घर के लग रहे हो? इस गरीब अछूत के घर क्या करने आए हो? उस सांवले लड़के के चेहरे पर एक बहुत ही प्यारी और ब्रह्मांड को मोह लेने वाली मुस्कान थी। उसकी बड़ी-बड़ी गोल आंखों में आंसू थे। उसने आगे बढ़कर उस बूढ़ी औरत के आंसू पोंछे और कहा माई दास काका ने जिंदगी भर मुझे कालिया और मेरे बड़े भाई को प्यार से पुकारा है। पूरी दुनिया ने उन्हें अछूत कहा लेकिन उन्होंने हमेशा अपना बेटा माना और जब एक पिता दुनिया से जाता है तो उसका बेटा उसे कंधा देने जरूर आता है। हम अपने पिता की अर्थी उठाने आए हैं माई। औरत सन्न रह गई। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। उन दोनों लड़कों ने बिना किसी झिझक के आगे बढ़कर उस अछूत माने जाने वाले दास की अर्थी को अपने कोमल कंधों पर उठा लिया। सांवला लड़का आगे की तरफ और गोरा लड़का पीछे की तरफ। जैसे ही वह अर्थी लेकर झोपड़ी से बाहर निकले, गांव के सरपंच और पंडित जो दूर खड़े तमाशा देख रहे थे, उनके होश उड़ गए। सरपंच चिल्लाया अरे ए लड़कों, तुम कौन हो? पागल हो गए हो क्या? यह एक नीची जाति का आदमी है। इसकी अर्थी को छुओगे तो तुम्हारा धर्म भ्रष्ट हो जाएगा। कौन हो तुम? गोरे लड़के यानी बलराम जी के रूप ने पलट कर सरपंच को ऐसी तेज और क्रोधित नजरों से देखा कि सरपंच के पैर वहीं जमीन पर जम गए। उसके मुंह से एक शब्द नहीं निकला। वो दोनों लड़के अर्थी लेकर गांव की सड़कों से श्मशान की तरफ बढ़ने लगे और सबसे बड़ा चमत्कार यह था कि जिस रास्ते से वह अर्थी गुजर रही थी वहां लाश की कोई बदबू नहीं बल्कि स्वर्ग के पारिजात के फूलों और भगवान के श्री अंग यानी शरीर की सुगंध फैल रही थी। गांव वाले पागलों की तरह उस खुशबू को सूंघ रहे थे। शमशान पहुंचकर उन दोनों भाइयों ने अपने हाथों से उस लकड़ी की चिता को सजाया। उस सांवले लड़के ने दास के माथे को चूमा और अपने हाथों से उसकी चिता को मुखाग्नि दी। दास का अंतिम संस्कार हो गया। उसकी बूढ़ी पत्नी रोते-रोते उनके पैरों में गिर पड़ी। लेकिन जैसे ही उसने नजर उठाई, वहां कोई नहीं था। वो दोनों लड़के हवा में गायब हो चुके थे।
जब अगली सुबह पूरी के मंदिर के मुख्य पुजारी ने महाप्रभु को जगाने के लिए गर्भ गृह के कपाट खोले यानी दरवाजे खोले तो अंदर का नजारा देखकर उनके हाथ से आरती की थाली छूट कर जमीन पर गिर पड़ी। पुजारी जोर-जोर से रोने और चीखने लगे। अनर्थ हो गया। हमारे भगवान को यह क्या हो गया? साक्षात भगवान जगन्नाथ और बड़े भाई बलराम जी की पवित्र लकड़ी की मूर्तियों पर श्मशान की राख लगी हुई थी। उनके पीले और नीले रेशमी कपड़ों पर कालिक पुती थी और उनसे चिता के जलने की गंध आ रही थी। और सबसे ज्यादा रुला देने वाली बात यह कि भगवान की वो बड़ी-बड़ी गोल आंखें रोने की वजह से एकदम लाल हो गई थी। मानो वो रात भर किसी के लिए फूट-फूट कर रोए हो। पुजारी दहाड़ मार मार कर रोने लगे। अनर्थ हो गया। हमारे भगवान को यह क्या हो गया? जल्दी से महा स्नान की तैयारी करो। भगवान को नहलाओ। पुजारी दौड़े-दौड़े पानी लाने गए। लेकिन तभी मुख्य पुजारी वहीं जमीन पर बेहोश होकर गिर पड़े। बेहोशी में मुख्य पुजारी को एक सपना आया। सपने में साक्षात जगन्नाथ जी आए। उनके चेहरे पर वही राख लगी थी। लेकिन उनके होठों पर एक प्यारी सी मुस्कान थी। भगवान ने कहा पुजारी रुक जाओ मेरे शरीर पर लगी इस राख को मत धोना। यह कोई साधारण राख नहीं बल्कि दुनिया के सबसे पवित्र चंदन से भी ज्यादा कीमती है। पुजारी ने रोते हुए पूछा। प्रभु यह किस चीज की राख है? आप रात को कहां गए थे? जगन्नाथ जी ने जो जवाब दिया उसे सुनकर पुजारी की रूह कांप गई। पुजारी जिसे तुम सब लोग नीची जाति का और अछूत कहते थे वह दास मेरा सबसे प्यारा भक्त था। कल रात जब उस गरीब की अर्थी उठाने वाला कोई नहीं था। जब पूरी दुनिया ने उसे दुत्कार दिया था। तब मैं और मेरा बड़ा भाई बलराम उसके बेटे बनकर उसकी अर्थी उठाने गए थे। यह उसी दास की चिता की राख है जो मुझे प्रेम से पुकारता है। मैं उसके हर सफर में उसके साथ खड़ा होता हूं। मेरे लिए कोई जातपात नहीं है। पुजारी की अचानक आंख खुली। वो पसीने से भीगे हुए थे। वो जोरजोर से रोने लगे। हे प्रभु हम कितने मूर्ख हैं। हम दिन रात आपकी पूजा करते हैं। लेकिन आपके असली रूप को वो अछूत दास पहचान गया। पुजारी उसी वक्त नंगे पैर दौड़ते हुए उस गांव की तरफ भागे जहां दास की झोपड़ी थी। जब वो वहां पहुंचे। पहुंचे तो उन्होंने देखा कि दास की बूढ़ी पत्नी उसी श्मशान की राख को अपने माथे पर लगा रही थी और रोते हुए कह रही थी मेरे कालिया ठाकुर तूने मेरे पति की लाज रख ली पुजारियों ने उस बूढ़ी औरत के पैर पकड़ ली और पूरे गांव वालों को दास की सच्ची भक्ति की कहानी बताई जो सरपंच कल तक दास को अछूत कहता था। आज वो उसी श्मशान की राख को अपने माथे पर लगा रहा था। यह है हमारे जगन्नाथ जी का असली रूप। वो महलों के छप्पन भोग के भूखे नहीं है। वह तो बस एक गरीब की झोपड़ी के सच्चे प्रेम के भूखे हैं। उनके दरबार में ना कोई राजा है ना कोई रंक ना कोई ऊंची जाति है ना नीची।

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Author: sssrknews

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