स्त्री की देह नोचे जाने के लिए ही है।
स्त्री सुरक्षा कोई मुद्दा नहीं है, स्वयं स्त्री के लिए भी। इस देश का एक ही मुद्दा है अपनी-अपनी विचारधारा और स्वार्थ को पकड़ चिल्लाते रहने का। वही बात स्त्री पर भी लागू होती है।
उसे ये समझ नहीं आता कि कोई युद्ध हो, ज़मीन-जायदाद की लड़ाई हो या कि मामूली झगड़ा हो, पुरुषों की हत्या होगी, पिटाई होगी पर स्त्री को पीटने के बाद, उसके साथ रेप होगा और, तब कहीं जाकर उसकी हत्या की जाएगी। समानता का यहाँ भी ठीक वैसे ही अभाव है जैसे अन्य सभी स्थानों पर।
समानता मात्र इतनी है कि स्त्री हिंदू की हो या मुसलमान की, सवर्ण की या दलित की, मौक़ा मिलने की बात है, बचेगी कोई भी नहीं। हालाँकि इस समानता को समझकर भी न समझने का दिखावा स्त्रियाँ ही करती हैं। कारण वही, विचारधारा।
विचारधारा के प्रति अंधभक्ति और अंधघृणा पुरुषों को तो मरवा रही ही है, स्त्रियों का बलात्कार, फिर हत्या के अतिरिक्त उन्हें अपनी सुरक्षा को मुद्दा बनाने से भी रोक दे रहीं।
उन्नाव में किसी स्त्री को कुछ होगा, विपक्ष वाले रोने लगेंगे, कांग्रेस के बड़े-बड़े नेता धरने पर बैठ जायेंगे। तृणमूल की फैंसी नेता मैडम को फ़ेमिनिज़म याद आ जाएगा। यही हाल सो कॉल्ड ख़ुद को नारीवादी कहने वाले लेखकों, पत्रकारों और अभिनेताओं का भी है। लेकिन, जैसे ही घटना कोलकाता, कर्नाटक या केरल में हो जाये, सब चुप।
क्योंकि अब बोलने की बारी सत्ता पक्ष की हो जाती है। पटना में एक नन्ही बच्ची को दरिंदों ने नोंच खाया, सिस्टम ने उसका साथ नहीं दिया, पर सरकार मौन तमाशा देख रही। मणिपुर में एक स्त्री का गैंग रेप हुआ, इंसाफ़ की उम्मीद में उसने दम तोड़ दिया लेकिन सता चुप। हाँ, विपक्ष बोल रहा, चीख रहा।
वो विपक्ष जो कर्नाटक के मंत्री के बयान पर चुप रहा जब उसने कहा कि रेप को एंजॉय करना चाहिए। विपक्ष तब भी चुप रहा जब समाजवादी पार्टी के नेता ने एक ऐसा ही बेतुका बयान दिया। बोलेगा विपक्ष, प्रतीक्षा करिए उस समय का जब यही बयान कोई सत्ता पक्ष वाला देगा।
कुछ नहीं बदलने वाला। स्त्रियां अपनी सुरक्षा से अधिक इस बात से चिंतित हैं कि उनकी विचारधारा वाले नेता के बेतुके बयान को कैसे जस्टिफाई किया जाये। यहाँ तक कि लड़ने को भी तैयार हैं। मेरे साथ ही हुआ था जब एक बार मैंने राहुल गांधी के किसी स्त्री विरोधी बयान पर कुछ कह दिया था। प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ बोलने पर तो राष्ट्रविरोधी ही हो जाते।
शंकराचार्य को गाली देने वाली स्त्रियां (हालांकि वे उसी लायक हैं) आज उनके साथ हुए दुर्व्यवहार के लिए रो रहीं। क्यों ? क्योंकि दुर्व्यवहार करने वाला सिस्टम उनके विरोधी विचारधारा का है। मंदिर के टूटने का शोक वे मना रहे जिन्हें इसके होने न होने से, कुछ महीनों पहले तक कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था। कारण वहीं, विचारधारा। ऐसा ही हाल उनका भी है जो सता पक्ष को समर्थन देने वाली स्त्रियां हैं।
जो वर्ग ये नहीं समझ पा रहा कि विचारधारा चाहे पक्ष की हो या विपक्ष की, उनके साथ होने का दिखावा तभी करेगी जब उसका फ़ायदा उन्हें मिलेगा। यह समय है, अपनी हर विचारधारा को भुला अपनी सुरक्षा की माँग करने का।
विपक्ष और पक्ष दोनों से सवाल पूछने का।
लेकिन, ये नहीं होगा।
तो प्रिय स्त्रियों अपनी-अपनी विचारधारा का हार पहनकर शांत बैठ जाओ और अपनी बारी की प्रतीक्षा करो।
बलात्कार, सामान्य है ????????????????????





