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जब मन संसार से हटकर भगवान की ओर मुड़ता है

*जब भगवान किसी जीव पर प्रसन्न होते हैं, तब धीरे-धीरे उसके हृदय की दिशा संसार से हटकर उनके ओर मुड़ने लगती है। वही वस्तुएँ, जो कभी अत्यंत आकर्षक लगती थीं, अपना आकर्षण खोने लगती हैं और वही भगवान, जिनका स्मरण कभी केवल पूजा-पाठ तक सीमित था, जीवन के केंद्र बनने लगते हैं।

यदि हम ईमानदारी से अपने जीवन की ओर देखें तो पाएँगे कि संसार में सबसे बड़ी समस्या बाहरी नहीं, भीतरी है। मनुष्य का वास्तविक संघर्ष बाहर के लोगों से नहीं, अपने ही अंतःकरण के भीतर चलने वाली आकर्षणों की धाराओं से होता है। विषयों का रस, भोगों का आकर्षण, ऐश्वर्य का मोह, प्रतिष्ठा की लालसा, प्रशंसा की भूख और अधिकार की इच्छा—ये सब देखने में बहुत मधुर प्रतीत होते हैं, परंतु इनकी कार्यप्रणाली अत्यंत सूक्ष्म है।
वे सामने से शत्रु बनकर नहीं आते। वे मित्र बनकर आते हैं। वे सुख का वचन देते हैं, संतोष का आश्वासन देते हैं, उपलब्धि का स्वप्न दिखाते हैं। परंतु धीरे-धीरे वे मनुष्य के चित्त पर अधिकार कर लेते हैं। यही कारण है कि संतों ने इन्हें साधारण आकर्षण नहीं, बल्कि चित्त के अपहरणकर्ता कहा है।

ज़रा विचार कीजिए। अपहरण का अर्थ क्या है? किसी व्यक्ति को उसके वास्तविक स्थान से हटाकर अपने नियंत्रण में ले लेना। यही कार्य विषय-वासनाएँ भी करती हैं। वे मनुष्य के चित्त को उसके वास्तविक स्वामी भगवान से दूर ले जाकर अपनी गिरफ्त में कर लेती हैं। तब व्यक्ति बाहर से स्वतंत्र दिखाई देता है, पर भीतर से बंधा हुआ होता है।

ऐसे व्यक्ति के पास धन हो सकता है, पद हो सकता है, सम्मान हो सकता है, परिवार हो सकता है, स्वास्थ्य भी हो सकता है; फिर भी उसके भीतर एक अनजानी बेचैनी बनी रहती है। उसे कुछ पाने की जल्दी रहती है, कुछ खो देने का भय रहता है, कुछ सिद्ध करने की चिंता रहती है। वह एक उपलब्धि प्राप्त करता है तो दूसरी की ओर दौड़ पड़ता है। एक इच्छा पूरी होती है तो दूसरी खड़ी हो जाती है। एक शिखर पर पहुँचता है तो दूसरा दिखाई देने लगता है।

बाहर से देखने वाले सोचते हैं कि वह अत्यंत सफल है। परंतु भीतर उसका चित्त अपहृत हो चुका होता है।
आपने देखा होगा कि संसार में अनेक लोग ऐसे मिल जाते हैं जिनके पास सब कुछ है, फिर भी शांति नहीं है। वे रात को सो नहीं पाते, अकेले बैठ नहीं पाते, मौन में टिक नहीं पाते। कारण यह नहीं कि उनके पास संसाधनों की कमी है; कारण यह है कि उनके अंतःकरण पर अपहरणकर्ताओं का अधिकार हो चुका है।

इसके विपरीत कभी-कभी कोई साधारण सा भक्त दिखाई देता है। उसके पास विशेष धन नहीं, विशेष पद नहीं, विशेष प्रसिद्धि नहीं। परंतु उसके चेहरे पर एक सहज प्रसन्नता होती है, उसकी आँखों में एक अद्भुत शांति होती है, उसके भीतर एक गहरा संतोष होता है। कारण यह है कि उसका चित्त अपने वास्तविक स्वामी के चरणों में सुरक्षित है।

शरीर का अपहरण हो जाए तो समाज सक्रिय हो जाता है। परिवार चिंतित हो जाता है। प्रशासन और कानून अपनी भूमिका निभाते हैं। खोजबीन होती है, प्रयास होते हैं और किसी न किसी प्रकार मुक्ति का मार्ग निकल आता है।
परंतु अंतःकरण का अपहरण उससे कहीं अधिक गंभीर है।

विडंबना यह है कि इस अपहरण का समाचार किसी अखबार में नहीं छपता। कोई पुलिस रिपोर्ट दर्ज नहीं होती। कोई अदालत सुनवाई नहीं करती। कोई बाहरी संस्था इस संकट को पहचान भी नहीं पाती।

एक व्यक्ति जीवन भर सम्मानित नागरिक बना रह सकता है, परंतु भीतर से विषयों का कैदी हो सकता है।
एक व्यक्ति समाज में आदरणीय पद पर बैठा होता है, परंतु भीतर से इच्छाओं का दास होता है।
एक व्यक्ति धार्मिक दिखता है, परंतु भीतर से अहंकार का बंधक होता है।
यही कारण है कि संत-महापुरुष बार-बार अंतःकरण की रक्षा पर इतना बल देते हैं।

अब प्रश्न उठता है कि इस अदृश्य बंधन से मुक्ति कैसे मिले?

यहाँ संतों का उत्तर अत्यंत सरल और अत्यंत गहरा है।

जिस प्रकार अंधकार को हटाने के लिए प्रकाश की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार चित्त के अपहरणकर्ताओं से मुक्त होने के लिए भगवान के नाम का आश्रय आवश्यक है।

भगवान का नाम केवल एक शब्द नहीं है। वह चित्त को उसके वास्तविक घर तक पहुँचाने वाला सेतु है। जब मनुष्य आर्त भाव से भगवान को पुकारता है, तब वह पुकार केवल ध्वनि नहीं रहती; वह आत्मा की दिशा बदलने लगती है।
धीरे-धीरे नाम चित्त को विषयों की गिरफ्त से निकालकर भगवान की ओर मोड़ देता है।

धीरे-धीरे वही मन, जो संसार की हजारों वस्तुओं में भटकता था, एक केंद्र प्राप्त करने लगता है।
धीरे-धीरे वही हृदय, जो असंख्य अपेक्षाओं से भरा हुआ था, भगवान के प्रेम में विश्राम पाने लगता है।
और धीरे-धीरे साधक अनुभव करता है कि वास्तविक स्वतंत्रता बाहरी परिस्थितियों से नहीं, अंतःकरण की भगवान में स्थिरता से आती है।

शायद इसी कारण भक्तों ने संसार की सबसे बड़ी उपलब्धि धन, पद, शक्ति या प्रतिष्ठा को नहीं माना। उन्होंने सबसे बड़ा सौभाग्य उस क्षण को माना जब भगवान के नाम में रस आने लगे, भगवान की कथा प्रिय लगने लगे, भगवान का स्मरण बोझ न लगकर आनंद लगने लगे।

क्योंकि यह वही क्षण है जब चित्त अपहरणकर्ताओं की गिरफ्त से निकलकर अपने वास्तविक स्वामी की शरण में लौटना प्रारंभ कर देता है।
और जब चित्त भगवान के चरणों में पहुँच जाता है, तब संसार वैसा ही रहता है, कर्तव्य वैसे ही रहते हैं, परिवार वैसे ही रहते हैं, जीवन की परिस्थितियाँ भी बहुत कुछ वैसी ही रहती हैं; परंतु भीतर एक गहरा परिवर्तन घटित हो जाता है।
अब मनुष्य संसार में रहता है, पर संसार उसके भीतर नहीं रहता।

अब वह वस्तुओं का उपयोग करता है, पर उनका दास नहीं बनता।
अब वह कर्म करता है, पर कर्म उसे बाँध नहीं पाते।
अब वह प्रेम करता है, पर आसक्ति का कैदी नहीं बनता।
अब वह जीता है, पर उसका हृदय भगवान के चरणों में स्थित रहता है।
और यहाँ से वास्तविक शांति, वास्तविक स्वतंत्रता और वास्तविक आनंद का उदय होता है। क्योंकि अंततः मनुष्य का चित्त किसी न किसी के अधीन अवश्य रहेगा—या तो संसार के आकर्षणों के अधीन, या भगवान के प्रेम के अधीन। संतों का अनुभव यही कहता है कि संसार की दासता बेचैनी देती है, जबकि भगवान की दासता ही वास्तविक मुक्ति बन जाती है।

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Author: sssrknews

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