ये कोई भाषण नहीं था,
न कोई मंचीय तालियाँ बटोरने वाला बयान।
ये एक नौकरीपेशा अफ़सर की आँखों से देखा हुआ सच था—
जो फाइलों में नहीं मिलता,
पर व्यवस्था की नसों में बहता है।
भारती सिंह ने जब यह किस्सा सुनाया,
तो शब्द नहीं गूँजे…
तुलनाएँ गूँजीं।
वो तुलनाएँ, जो सत्ता और सेवा के बीच का फर्क बता देती हैं।
CISF में उच्च पद पर रहते हुए
लखनऊ, दिल्ली, जोधपुर, जम्मू—
देश के सबसे संवेदनशील एयरपोर्ट्स की सुरक्षा संभालने वाली
एक अफ़सर ने
तीन प्रधानमंत्रियों का समय देखा।
अटल बिहारी वाजपेयी का दौर,
मनमोहन सिंह का युग
और अब—
नरेंद्र मोदी का काल।
अटल जी जब प्रधानमंत्री होते हुए
अपने संसदीय क्षेत्र लखनऊ उतरते थे,
तो प्रोटोकॉल होता था—
सम्मान के साथ,
पर सीमा में।
सरकारी मशीनरी चलती थी,
पर बेकाबू नहीं होती थी।
एयरपोर्ट पर सरकारी अमला,
तामझाम,
औपचारिकता—
और कैटरिंग का बिल
एक–डेढ़ लाख में निपट जाता था।
फिर एक दौर आया
जब सत्ता के साथ
शानो-शौकत ने स्थायी ठिकाना बना लिया।
कांग्रेस शासन में
यदि प्रधानमंत्री या सोनिया गांधी का आगमन होता,
तो वही एयरपोर्ट,
वही व्यवस्था—
लेकिन बिल
दस लाख के पार छलाँग लगा देता था।
मानो देश नहीं,
किसी राजदरबार की दावत हो।
और फिर
समय ने करवट बदली।
नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने।
कश्मीर—
जम्मू, श्रीनगर, कटरा, लेह-लद्दाख—
देश का सबसे चुनौतीपूर्ण इलाका,
जहाँ दौरे सबसे कठिन होते हैं,
वहाँ वे बार-बार गए।
एक बार जम्मू एयरपोर्ट पर
प्रधानमंत्री उतरे।
सबकी निगाहें थीं—
अब देखो खर्चे की फाइल कैसे फूलती है।
लेकिन जब कैटरर का बिल आया,
तो उसमें लिखा था—
₹3500।
हाँ,
सिर्फ साढ़े तीन हज़ार।
वो भी प्रधानमंत्री के लिए नहीं,
CISF और एयर इंडिया के स्टाफ़ के लिए
कैंटीन से आई चाय-नाश्ते का।
प्रधानमंत्री और उनका अमला
ट्रांज़िट में
अपनी जेब से चाय पीते हैं।
सरकारी दौरे में
निजी खर्च—
और बदले में
सिर्फ वही TA-DA
जो नियम में लिखा है।
कोई विशेषाधिकार नहीं।
कोई छिपी हुई सुविधा नहीं।
भारती बताती हैं—
22 साल की सेवा में
उन्होंने विदेश दौरों की तैयारियाँ भी देखी हैं।
पहले प्रधानमंत्री का जहाज़
विदेश जाता था
तो उसमें क्या-क्या लादा जाता था—
वो सब
लिखने लायक नहीं,
और बताने लायक तो और भी नहीं।
पत्रकारों की फ़ौज जाती थी।
निजी न्यूज़ चैनलों की भीड़।
और खर्चे?
ऐसे जैसे देश नहीं,
किसी अमीर कंपनी का टूर हो।
आज?
सिर्फ दूरदर्शन के
तीन–चार लोग।
काम के लिए।
दिखावे के लिए नहीं।
ये कहानी शराब की बोतलों की नहीं,
क्योंकि पहले भी कुछ दौर ऐसे थे
जहाँ खुलेआम “नदियाँ” नहीं बहती थीं।
पर ये कहानी है
नियत की।
संस्कार की।
और उस सोच की
जो सत्ता को सेवा मानती है,
और सेवा को बोझ नहीं बनने देती।
ये लेख
किसी पार्टी का विज्ञापन नहीं है।
ये एक सिस्टम का एक्स-रे है।
जो बताता है कि
जब शीर्ष पर बैठा आदमी
अपनी चाय का पैसा खुद देता है,
तो नीचे तक
लूट की आदत खुद-ब-खुद
शर्मिंदा होने लगती है।
और शायद
यही वजह है कि
कुछ लोगों को
ये सादगी
सबसे ज़्यादा चुभती है।






