जब रामानंद सागर जी ने सेट पर राम को राम होना सिखाया रामायण शूटिंग की एक अनसुनी कथा…!!
वो सुबह कुछ अलग थी रामायण के सेट पर आज सीता स्वयंवर का दृश्य फिल्माया जाना था चारों ओर भव्य सभा, रंग-बिरंगे वस्त्रों में राजा, भारी-भरकम धनुष और बीच में खड़े थे अरुण गोविल जी, शांत, गंभीर, जैसे सचमुच अयोध्या के राम हों…!!
लेकिन कैमरा चालू होने से पहले रामानंद सागर जी धीरे-धीरे मंच पर आए उनकी आँखों में वही गहराई थी, जिसमें शास्त्र भी थे और अनुभव भी उन्होंने अरुण गोविल जी से कहा देखिए, ये सिर्फ धनुष उठाने का दृश्य नहीं है यह क्षण है, जब संसार पहली बार समझेगा कि राम शक्ति से नहीं मर्यादा से धनुष उठाते हैं…!!
सेट पर अचानक सन्नाटा छा गया रामानंद सागर जी ने आगे कहा आप जब धनुष की ओर बढ़ें, तो चेहरे पर गर्व नहीं, बल्कि सहजता होनी चाहिए जैसे ये धनुष आपके लिए बोझ नहीं, कर्तव्य हो…!!
फिर उन्होंने राजाओं की ओर इशारा किया जो राजा धनुष उठाने में असफल हो रहे थे उनके बारे में भी सागर जी ने पहले ही समझा रखा था कोई राजा अहंकार से आएगा,
कोई बल से, कोई हंसी उड़ाने के लिए आप सबको वही भाव निभाना है…!!
क्योंकि राम की महानता दूसरों को नीचा दिखाने से नहीं,
खुद को सहज रखने से दिखेगी कई कलाकारों को यह नहीं पता था कि उन्हें बार-बार क्यों गिरना है क्यों पसीना दिखाना है…!!
रामानंद सागर जी ने मुस्कुरा कर कहा जब राम धनुष उठाएँगे, तो दर्शक को याद आना चाहिए कि ये वही राम हैं जो आगे चलकर जंगल में भी नंगे पाँव चलेंगे…!!
शूटिंग शुरू हुई राजा आए, धनुष हिला, लेकिन उठा नहीं किसी का हाथ काँपा, किसी का अभिमान टूटा और फिर राम आगे बढ़े…!!
सागर जी ने कैमरा रोक दिया नहीं, थोड़ा रुकिएराम कभी जल्दी नहीं करते उन्होंने अरुण गोविल जी से कहा एक पल के लिए आँखें नीचे करें, मानो पिता जनक और माता सीता का मान हृदय में रख रहे हों…!!
फिर कैमरा चला राम आगे बढ़े, धनुष को स्पर्श किया और जैसे ही उठाया धनुष टूटा नहीं, मर्यादा प्रकट हुई सेट पर कई लोग भावुक हो गए कुछ की आँखें भर आईं शूट खत्म होने के बाद अरुण गोविल जी ने हाथ जोड़कर कहा आज आपने अभिनय नहीं, मुझे राम जी का भाव सिखाया…!!
रामानंद सागर जी ने बस इतना कहा मैं रामायण नहीं बना रहा, मैं चाहता हूँ कि आने वाली पीढ़ी राम को महसूस करे यही कारण है कि दशकों बाद भी रामायण सिर्फ एक धारावाहिक नहीं, श्रद्धा का ग्रंथ बन गई…!!
जय श्रीराम






