भारतवर्ष की धरा पर एक शंकराचार्य ऐसे भी हैं ,
जिसकी पहचान न रथ से है , न रक्षक से, न किसी राजसी तामझाम से। फिर भी जब उनकी दिव्य वाणी गूँजती है ,तो सिंहासन पर बैठे शासक चाहे मोदी- योगी हों अथवा इसरो- एम्स- सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस स्वयं खड़े हो जाते हैं और मंत्र मुग्ध हो कर सुनते हैं । यह सम्मान किसी भी साशन व्यवस्था ने उनको नहीं दिया है , मीडिया- व्यापार- साशन तंत्र को यह डर है— विचारों की ऊँचाई का , उनकी साधारण सी वाणी में उसके शब्द इतने भारी और असाधारण होते हैं कि सत्ता उन्हें बैठकर सुनने का साहस ही नहीं कर पाती है वह जहाँ भी पहुंचते हैं चाहे जेएनयू- हाई कोर्ट- सुप्रीम कोर्ट- इसरो- एम्स- मंत्रालय- महाकुंभ- पीठ पहले अपने भीतर के ‘मैं’ को उतार दिया, वीआईपी कांड को ख़त्म करते हैं फिर धरती को स्पर्श करते हैं । आप श्री की यात्रा पैरों से नहीं,अंतरात्मा से पूरी होती है । आप गंगा तक पहुँचने का मार्ग नहीं माँगते हैं ।
आपश्री में संगम तक पहुँचने की अधीरता नहीं दिखती है । आप तो ज्ञान का जाम हुए मार्ग को प्रशस्त करते हैं , फिर गंगा तक पहुँचने में आपको क्या परेशानी होगी! गंभीर, मौन और सब कुछ बिना शर्त स्वीकार करने वाला। आप भली भांति जानतें हैं जो वास्तव में पवित्र है , असली है वही सत्य है और सत्य को साबित करने के लिए उसे सिद्ध करने के लिए छत्र , चँवर भीड़ की ज़रूरत नहीं होती।
और आज जब छोटा सा गेरुआ वस्त्र धारण किया संत गंगा से पहले प्रशासन से पूछता है। कौन सा रास्ता मिलेगा, कितनी सुरक्षा होगी, कौन आगे चलेगा और कौन पीछे रुकेगा। अब संगम साधना नहीं, एक नियोजित कार्यक्रम है। जिस कालखंड में संतों का सम्मान अब अनुभूति नहीं रहा, वह नापा जाता है— नक़ली घेरों में, फासलों में और आदेशों की मुहर में। उस जमाने में भी एक शंकराचार्य उतरतें हैं ट्रेन से। न कोई ढाल बनता है , न कोई सत्ता साथ चलती है, ना कोई लाव लश्कर, ना कोई छत्र- चँवर । आपके तर्कों में न आग्रह होता है और न आक्रोश।
सत्य और धर्म आपके पीछे नहीं, साथ-साथ चलता है । मीडिया- व्यापार – राजनीति तंत्र द्वारा पोषित आज का शंकराचार्य कुछ मीटर पर ठिठक जाता है। इसलिए नहीं कि मार्ग कठिन है, बल्कि इसलिए कि अब संवाद नहीं, दबाव काम करता है। और जहाँ दबाव बोलता है, वहाँ शास्त्र मौन धारण कर लेते हैं। राजनीतिक दलों के नक़ली शंकराचार्यों में वेदांत नहीं बचता— केवल हठ शेष रह जाता है । पूरी शंकराचार्य पद से ऊपर उठकर खड़े हैं । राजनीतिक दलों का शंकराचार्य पद के नीचे दबा हुएँ है। धर्म का चँवर-छत्र आपके सिर पर नहीं, बल्कि आपके चरित्र पर टिका हुआ है जिनके सिर पर छत्र- चँवर है—को टूट रहा है, वो बिखर रहा है । किसी भी साशन तंत्र में इतनी शक्ति नहीं की किसी शंकराचार्य का छत्र गिरा दे ,वह अपने ही बोझ से बिखर रहा है । यही असली अंतर है। इसीलिए पुरी शंकराचार्य महाभाग शताब्दियों बाद भी ग्रंथों में जीवित रहेंगे, समस्त सनातन धर्म अनुयायी नतमस्तक होंगे ।






