“जो भी उचित लगे, वही करो”
अगर प्रधानमंत्री का यह वाक्य राहुल गांधी और उनके समर्थकों की नज़र में कायरता या सरेंडर है,
तो फिर एक सवाल बनता है👇
👉 जब उनके नाना, दादी, पिता और माता की सरकारों में “साहसिक फैसले” लिए गए थे,
तो उनके इतिहास की चर्चा से डर क्यों लगता है?
👉 संसद में इतिहास याद दिलाने पर बौखलाहट क्यों?
👉 मंत्रियों से उलझने और हाथापाई की नौबत क्यों?
आइए ज़रा ठंडे दिमाग से समझते हैं —
लोकसभा में वास्तव में डरा कौन और असहज कौन हुआ?
लगातार चुनावी हार, मुद्दों की कमी और मोदी से सीधी राजनीतिक लड़ाई में असफलता—
यही हताशा अब राहुल गांधी को ऐसे बयानों की ओर धकेल रही है,
जहाँ सवाल सरकार से कम, देश की सुरक्षा नीति पर ज़्यादा उठाए जा रहे हैं।
बजट सत्र में जनता से जुड़े मुद्दों की जगह
2020 में सेना को दी गई ऑपरेशनल फ्रीडम को “सरेंडर” बताया जा रहा है—
जबकि यही इतिहास गवाही देता है कि
उनकी सरकारों में तो चीन के साथ यह तक तय था कि
सीमा पर हथियार तक इस्तेमाल नहीं होंगे।
अब जब सरकार और सेना पर सवाल उठाए जाएंगे,
तो इतिहास सामने रखा जाएगा ही।
और जब निशिकांत दुबे ने किताबों और दस्तावेज़ों के हवाले से
गांधी परिवार के फैसलों की चर्चा शुरू की,
तो जवाब तर्क से नहीं—हंगामे से दिया गया।
यह दृश्य लोकतंत्र के लिए दुर्भाग्यपूर्ण था।
अब बात भावनाओं की नहीं,
देश की सुरक्षा और फैसलों की है।
इसलिए राहुल गांधी को देश को साफ़-साफ़ बताना चाहिए👇
आखिर सरेंडर कब हुआ और किसके दौर में?
🔹 तिब्बत भारत की सुरक्षा ढाल था—
हिंदी-चीनी भाई-भाई के नारे के बीच सेना पीछे क्यों हटी?
🔹 चीन भारत का पड़ोसी कैसे बना—
रणनीति से या चूक से?
🔹 “बंजर ज़मीन” कहकर अक्साई चीन छोड़ना—
साहस था या मजबूरी?
🔹 1971 में 92,000 पाक सैनिक बंदी बने—
फिर भी जीती हुई ज़मीन और POK क्यों नहीं लिया गया?
🔹 60 साल सत्ता में रहने के बाद भी
चीन सीमा पर सड़कें क्यों नहीं थीं?
सेना आख़िरी चौकी तक क्यों नहीं पहुँच पाती थी?
🔹 चीन से तनाव के बीच
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से पारिवारिक समझौते किस श्रेणी में आएंगे?
🔹 26/11 के बाद सेना तैयार थी—
लेकिन कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
🔹 बाटला हाउस के शहीदों पर सवाल और
आतंकियों के प्रति संवेदना—
यह किस नीति का हिस्सा था?
🔹 आतंकियों से भिड़ने वाले पुलिस अधिकारियों पर केस—
यह किस संदेश के लिए था?
ये सवाल नफरत से नहीं,
इतिहास और दस्तावेज़ों से निकले हैं।
मुझे पता है—
राहुल और प्रियंका के पास इन फैसलों का कोई ठोस जवाब नहीं है।
लेकिन उनके समर्थकों के पास तो होगा?
अगर है,
तो तर्क से लिखिए,
तथ्यों से लिखिए,
भावना से नहीं—इतिहास से लिखिए।
और अगर ये सवाल ज़रूरी लगते हैं,
तो पोस्ट को शेयर कीजिए—
ताकि देश तय करे कि
बहादुरी क्या होती है
और सरेंडर किसे कहते हैं।






