जन्मकुंडली में शेयर मार्किट में आकस्मिक लाभ के योग कब बनते हैं,108 उपनिषदों की सूची एवं कुलदेवता कौन होते हैं आओ जानें
जिनकी कुंडली में ग्रहों की नीचे दीये गए विवरण जैसी खास स्थिति होती है उन जातको को शेयर से आकस्मिक लाभ मिलता है। तो देखिए आपकी जन्मपत्री में भी ऐसे योग तो नहीं बन रहे।
१ यदि किसी जन्मपत्री में पांचवें घर में गुरू के साथ पहले घर यानी लग्न के स्वामी ग्रह बैठे हों तब व्यक्ति को अचानक से धन लाभ मिलता रहता है। उदाहरण के तौर पर आप देख सकते हैं कि इस तस्वीर में मेष लग्न के स्वामी मंगल गुरू के साथ पांचवें घर में बैठे हैं।
२ यदि किसी कुंडली के पांचवें घर में चंद्र है और उस पर शुक्र की दृष्टि है तो यह भी अचानक धन प्राप्त होने का योग है।
३ यदि किसी जन्मपत्री में दूसरे घ्ार यानी ध्ान भाव और ग्यारहवें घर यानी लाभ स्थ्ाान के स्वामी चौथे घर में साथ बैठे हों और उन पर किसी शुभ ग्रह की दृष्टि है तो आपको अचानक धन मिल सकता है।
४ यदि जन्मपत्री के केन्द्र स्थान यानी पहले, चौथे, सातवें और दसवें घर में कोई शुभ ग्रह हैं मजबूत स्थिति में हों तो यह व्यक्ति को आकस्मिक लाभ दिलाता है।
५ यदि आपका आपका जन्म मीन लग्न में हुआ है और आपकी कुंडली में पांचवें घर में बुध है और ग्यारहवें घर यानी आय स्थान में शनि है तो यह शेयर सट्टे में अचानक लाभ का योग बनाता है।
जन्म कुंडली के दशम भाव में ग्रह अनुसार व्यवसाय विचार
पैतृक व्यवसाय (औषधि, ठेकेदारी, सोने का व्यवसाय, वस्त्रों का क्रय-विक्रय आदि) से उन्नति होती है। ये जातक प्रायः सरकारी नौकरी में उच्च पद प्राप्त करते है।
दशम स्थान में चन्द्र हो तो जातक मातृ कुल का व्यवसाय या माता के धन से (आभूषण, मोती, खेती, वस्त्र आदि) व्यवसाय करता है।
मंगल हो तो जातक भाइयों के साथ पार्टनरशिप (बिजली के उपकरण, अस्त्र-शस्त्र, आतिशबाजी, वकालत, फौजदारी) में व्यवसाय लाभ देता है। ये व्यक्ति सेना, पुलिस में भी सफल होते हैं।
बुध हो तो ऐसे जातको को मित्रों के साथ व्यवसाय लाभ देता है। लेखक, कवि, ज्योतिषी, पुरोहित, चित्रकला, भाषणकला संबंधी कार्य में लाभ होता है।
बृहस्पति हो तो जातक को भाई-बहनों के साथ व्यवसाय में लाभ, इतिहासकार, प्रोफेसर, धर्मोपदेशक, जज, व्याख्यानकर्ता आदि कार्यों में लाभ होता है।
शुक्र हो तो पत्नी से धन लाभ, व्यवसाय में सहयोग। जौहरी का कार्य, भोजन, होटल संबंधी कार्य, आभूषण, पुष्प विक्रय आदि कामों में लाभ होता है।
शनि हो तो शनि अगर दसवें भाव में स्वग्रही यानी अपनी ही राशि का हो तो 36वें साल के बाद फायदा होता है। ऐसे जातक अधिकांश नौकरी ही करते हैं। अधिकतर सिविल या मैकेनिकल इंजीनियरिंग में जाते है। लेकिन अगर दूसरी राशि या शत्रु राशि का हो तो बेहद तकलीफों के बाद सफलता मिलती है। अधिकांश मामलों में कम स्तर के मशीनरी कामकाज से व्यक्ति जुदा हो जाता है।
राहू हों तो अचानक लॉटरी से, सट्टे से या शेयर से व्यक्ति को लाभ मिलता है। ऐसे जातक राजनीति में विशेष रूप सफल रहते हैं।
केतु हो तो केतु की दशम में स्थिति संदिग्ध मानी जाती है किंतु अगर साथ में अच्छे ग्रह हो तो उसी ग्रह के अनुसार फल मिलता है लेकिन अकेला होने या पाप प्रभाव में होने पर केतु व्यक्ति को करियर के क्षेत्र में डूबो देता है।
कुलदेवता को प्रसन्न करने के लिए आजमाएं ये उपाय, घर में बढ़ेगी सुख-समृद्धि🕉️
हिंदू धर्म में कुलदेवता का विशेष महत्व है। हर परिवार के अपने कुलदेवता होते हैं, जिनका घर में एक विशेष स्थान होता है या फिर गांव में मंदिर होता है। मान्यता है कि कुलदेवता की नियमित पूजा-पाठ करने और उनसे जुड़ी परंपराओं का सही तरीके से पालन करने से परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
अगर कुलदेवता नाराज होते हैं, तो इसका असर हमारे परिवार पर भी देखने को मिलता है। घर में बात-बात पर कलेश बढ़ना, लगातार धन हानि होना या परिवार के सदस्यों का बार-बार बीमार होना। चलिए जानते हैं कुल देवता को मानाने के लिए कौन-कौन से उपाय करें।
कौन होते हैं कुल देवता
हिन्दू परंपरा के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी देवी-देवता या ऋषि परंपरा से जुड़ा माना जाता है, जिनकी पूजा उनके पूर्वज सदियों से करते आ रहे हैं। कुलदेवी या कुलदेवता उस परिवार के वंश और गोत्र से जुड़े होते हैं और उसी गोत्र या समुदाय के अन्य लोगों को भी एक सूत्र में बांधते हैं। इस तरह एक ही जाति, गोत्र या समूह के लोगों का एक साझा कुलदेवी या कुलदेवता होता है, जिनके लिए मंदिर स्थापित किया जाता है और वहां नियमित पूजा-अर्चना की जाती है। यदि लोग अपने मूल स्थान से दूर भी बस जाएं, तो भी समय-समय पर वे उस मंदिर में दर्शन के लिए जरूर जाते हैं।
कुल देवता के नाराज होने के लक्षण
अगर नौकरी, व्यापार, पढ़ाई या विवाह जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में लगातार प्रयास करने के बावजूद अपेक्षित सफलता न मिलना, कुलदेवता की नाराजगी का प्रमुख संकेत माना जाता है।
अगर बीमारी बार-बार पीछा नहीं छोड़ती है, तब माना जाता है कि कुलदेवता नाराज हैं।
विवाह और वैवाहिक जीवन में अड़चनें आने लगे, तो यह संकेत कुल देवता के नाराज होने की है।
घर में बिना वजह झगड़े होना, गुस्सा बढ़ना, आपसी दूरी आना या मन कमजोर लगना, ये सब कुलदेवता के नाराज होने के संकेत माने जाते हैं।
अगर बच्चों को बार-बार नींद में डर लगना, घबराहट होना या उनकी नींद बार-बार टूटना शुरू हो जाए, तो इसे कुलदेवता की नाराजगी का संकेत माना जाता है।
कुलदेवता को प्रसन्न करने के उपाय
– नियमित रूप से कुलदेवता की पूजा-अर्चना करें।
– हर साल कुलदेवता के नाम से विशेष अनुष्ठान या हवन करवाएं।
– मंगलवार या शनिवार को गणेश जी और कुलदेवता की संयुक्त पूजा करें।
– यदि नाराजगी के संकेत मिलें, तो पूरा परिवार मिलकर कुलदेवता के नाम का जाप करें।
– घर के मुख्य द्वार पर स्वास्तिक चिन्ह या कुलदेवता का चित्र लगाएं।
– पूजा के समय साफ-सफाई और श्रद्धा का विशेष ध्यान रखें।
108 उपनिषदों की सूची
१.ईशोपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, मुख्य उपनिषद्
२.केन उपनिषद् = साम वेद, मुख्य उपनिषद्
३.कठ उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, मुख्य उपनिषद्
४.प्रश्न उपनिषद् = अथर्व वेद, मुख्य उपनिषद्
५.मुण्डक उपनिषद् = अथर्व वेद, मुख्य उपनिषद्
६.माण्डुक्य उपनिषद् = अथर्व वेद, मुख्य उपनिषद्
७.तैत्तिरीय उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, मुख्य उपनिषद्
८.ऐतरेय उपनिषद् = ऋग् वेद, मुख्य उपनिषद्
९.छान्दोग्य उपनिषद् = साम वेद, मुख्य उपनिषद्
१०.बृहदारण्यक उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, मुख्य उपनिषद्
११.ब्रह्म उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
१२.कैवल्य उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, शैव उपनिषद्
१३.जाबाल उपनिषद् (यजुर्वेद) = शुक्ल यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
१४.श्वेताश्वतर उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
१५.हंस उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, योग उपनिषद्
१६.आरुणेय उपनिषद् = साम वेद, संन्यास उपनिषद्
१७.गर्भ उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
१८.नारायण उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, वैष्णव उपनिषद्
१९.परमहंस उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
२०.अमृत-बिन्दु उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, योग उपनिषद्
२१.अमृत-नाद उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, योग उपनिषद्
२२.अथर्व-शिर उपनिषद् = अथर्व वेद, शैव उपनिषद्
२३.अथर्व-शिख उपनिषद् =अथर्व वेद, शैव उपनिषद्
२४.मैत्रायणि उपनिषद् = साम वेद, सामान्य उपनिषद्
२५.कौषीतकि उपनिषद् = ऋग् वेद, सामान्य उपनिषद्
२६.बृहज्जाबाल उपनिषद् = अथर्व वेद, शैव उपनिषद्
२७.नृसिंहतापनी उपनिषद् = अथर्व वेद, वैष्णव उपनिषद्
२८.कालाग्निरुद्र उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, शैव उपनिषद्
२९.मैत्रेयि उपनिषद् = साम वेद, संन्यास उपनिषद्
३०.सुबाल उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
३१.क्षुरिक उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, योग उपनिषद्
३२.मान्त्रिक उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
३३.सर्व-सार उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
३४.निरालम्ब उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
३५.शुक-रहस्य उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
३६.वज्रसूचि उपनिषद् = साम वेद, सामान्य उपनिषद्
३७.तेजो-बिन्दु उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
३८.नाद-बिन्दु उपनिषद् = ऋग् वेद, योग उपनिषद्
३९.ध्यानबिन्दु उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, योग उपनिषद्
४०.ब्रह्मविद्या उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, योग उपनिषद्
४१.योगतत्त्व उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, योग उपनिषद्
४२.आत्मबोध उपनिषद् = ऋग् वेद, सामान्य उपनिषद्
४३.परिव्रात् उपनिषद् (नारदपरिव्राजक) = अथर्व वेद, संन्यास उपनिषद्
४४.त्रिषिखि उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, योग उपनिषद्
४५.सीता उपनिषद् = अथर्व वेद, शाक्त उपनिषद्
४६.योगचूडामणि उपनिषद् = साम वेद, योग उपनिषद्
४७.निर्वाण उपनिषद् = ऋग् वेद, संन्यास उपनिषद्
४८.मण्डलब्राह्मण उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, योग उपनिषद्
४९.दक्षिणामूर्ति उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, शैव उपनिषद्
५०.शरभ उपनिषद् = अथर्व वेद, शैव उपनिषद्
५१.स्कन्द उपनिषद् (त्रिपाड्विभूटि) = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
५२.महानारायण उपनिषद् = अथर्व वेद, वैष्णव उपनिषद्
५३.अद्वयतारक उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
५४.रामरहस्य उपनिषद् = अथर्व वेद, वैष्णव उपनिषद्
५५.रामतापणि उपनिषद् = अथर्व वेद, वैष्णव उपनिषद्
५६.वासुदेव उपनिषद् = साम वेद, वैष्णव उपनिषद्
५७.मुद्गल उपनिषद् = ऋग् वेद, सामान्य उपनिषद्
५८.शाण्डिल्य उपनिषद् = अथर्व वेद, योग उपनिषद्
५९.पैंगल उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
६०.भिक्षुक उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
६१.महत् उपनिषद् = साम वेद, सामान्य उपनिषद्
६२.शारीरक उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
६३.योगशिखा उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, योग उपनिषद्
६४.तुरीयातीत उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
६५.संन्यास उपनिषद् = साम वेद, संन्यास उपनिषद्
६६.परमहंस-परिव्राजक उपनिषद् = अथर्व वेद, संन्यास उपनिषद्
६७.अक्षमालिक उपनिषद् = ऋग् वेद, शैव उपनिषद्
६८.अव्यक्त उपनिषद् = साम वेद, वैष्णव उपनिषद्
६९.एकाक्षर उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
७०.अन्नपूर्ण उपनिषद् = अथर्व वेद, शाक्त उपनिषद्
७१.सूर्य उपनिषद् = अथर्व वेद, सामान्य उपनिषद्
७२.अक्षि उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
७३.अध्यात्मा उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
७४.कुण्डिक उपनिषद् = साम वेद, संन्यास उपनिषद्
७५.सावित्रि उपनिषद् = साम वेद, सामान्य उपनिषद्
७६.आत्मा उपनिषद् = अथर्व वेद, सामान्य उपनिषद्
७७.पाशुपत उपनिषद् = अथर्व वेद, योग उपनिषद्
७८.परब्रह्म उपनिषद् = अथर्व वेद, संन्यास उपनिषद्
७९.अवधूत उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
८०.त्रिपुरातपनि उपनिषद् = अथर्व वेद, शाक्त उपनिषद्
८१.देवि उपनिषद् = अथर्व वेद, शाक्त उपनिषद्
८२.त्रिपुर उपनिषद् = ऋग् वेद, शाक्त उपनिषद्
८३.कठरुद्र उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
८४.भावन उपनिषद् = अथर्व वेद, शाक्त उपनिषद्
८५.रुद्र-हृदय उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, शैव उपनिषद्
८६.योग-कुण्डलिनि उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, योग उपनिषद्
८७.भस्म उपनिषद् = अथर्व वेद, शैव उपनिषद्
८८.रुद्राक्ष उपनिषद् = साम वेद, शैव उपनिषद्
८९.गणपति उपनिषद् = अथर्व वेद, शैव उपनिषद्
९०.दर्शन उपनिषद् = साम वेद, योग उपनिषद्
९१.तारसार उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, वैष्णव उपनिषद्
९२.महावाक्य उपनिषद् = अथर्व वेद, योग उपनिषद्
९३.पञ्च-ब्रह्म उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, शैव उपनिषद्
९४.प्राणाग्नि-होत्र उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
९५.गोपाल-तपणि उपनिषद् = अथर्व वेद, वैष्णव उपनिषद्
९६.कृष्ण उपनिषद् = अथर्व वेद, वैष्णव उपनिषद्
९७.याज्ञवल्क्य उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
९८.वराह उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
९९.शात्यायनि उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
१००.हयग्रीव उपनिषद् (१००) = अथर्व वेद, वैष्णव उपनिषद्
१०१.दत्तात्रेय उपनिषद् = अथर्व वेद, वैष्णव उपनिषद्
१०२.गारुड उपनिषद् = अथर्व वेद, वैष्णव उपनिषद्
१०३.कलि-सन्तारण उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, वैष्णव उपनिषद्
१०४.जाबाल उपनिषद् (सामवेद) = साम वेद, शैव उपनिषद्
१०५.सौभाग्य उपनिषद् = ऋग् वेद, शाक्त उपनिषद्
१०६.सरस्वती-रहस्य उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, शाक्त उपनिषद्
१०७.बह्वृच उपनिषद् = ऋग् वेद, शाक्त उपनिषद्
१०८.मुक्तिक उपनिषद् (१०८) = शुक्ल यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्।।






