मुंबई: महाराष्ट्र की सियासत में आज अहम दिन है। जब बीस साल से एक दूसरे से दूरी बनाकर रखने वाले उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे आज एक मंच पर नजर आने वाले हैं। दोनों भाइयों ने पहले राज्य सरकार की थ्री लैंग्वेज पॉलिसी के विरोध में आज एक रैली का ऐलान किया था लेकिन विवाद बढ़ने पर महाराष्ट्र सरकार ने थ्री लैंग्वेज पॉलिसी को फिलहाल स्थगित कर दिया।
शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (राज ठाकरे) अब हर साल 9 जुलाई को ‘मराठी विजय दिन’ के तौर पर मनाएंगी। 20 साल बाद ठाकरे बंधु एक मंच पर नजर आएंगे, जिससे राजनीतिक गलियारों में कयासों का दौर शुरू हो गया है कि क्या दोनों दल भविष्य में कोई राजनीतिक गठजोड़ कर सकते हैं। यही वजह है कि आज की इस साझा रैली में दोनों नेताओं के भाषण पर खास नजर बनी रहेगी — क्या वे मिलकर आगे की रणनीति का संकेत देंगे या सिर्फ सांस्कृतिक एकता तक बात सीमित रहेगी?
इस रैली में कांग्रेस शामिल नहीं हो रही है, वहीं बीजेपी ने तंज कसते हुए कहा है कि BMC चुनाव को देखते हुए दोनों भाई साथ आ रहे हैं, न कि किसी विचारधारा के तहत।
हिंदी को लेकर उद्धव और राज ठाकरे की राय
उद्धव ठाकरे का कहना है कि वे हिंदी भाषा के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन किसी भी भाषा को थोपना उचित नहीं है। वे केंद्र की तीन भाषा नीति का विरोध करते हैं। दूसरी ओर, राज ठाकरे का मानना है कि यह एक निरंकुश शासन स्थापित करने की कोशिश है और मराठी भाषा की अहमियत को कम करने की साजिश।
क्या है पूरा मामला?
महाराष्ट्र सरकार ने इस साल 16 और 17 अप्रैल को हिंदी अनिवार्य करने से जुड़े दो आदेश दिए थे। इसके विरोध में उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे ने 5 जुलाई को संयुक्त रैली का ऐलान किया था। बाद में 29 जून को सरकार ने दोनों आदेश रद्द कर दिए। इस पर उद्धव ने दावा किया कि विपक्षी पार्टियों के विरोध की वजह से सरकार को फैसला वापस लेना पड़ा। आज इस फैसले को लेकर विजय रैली के लिए दोनों भाई एक साथ आ रहे हैं। राज ठाकरे ने 2006 में शिवसेना छोड़कर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) के नाम से नई पार्टी बनाई थी। शिवसेना उद्धव गुट के नेता संजय राउत इस मौके को उत्सव बता रहे हैं।
हालांकि दोनों भाई एक साथ जरूर आ रहे हैं, लेकिन राज ठाकरे का पॉलिटिकल ग्राफ लगातार गिरते जा रहा है। साल 2009 के विधानसभा चुनाव में राज ठाकरे की पार्टी मनसे को 13 सीट मिली थीं। 2014 में राज की पार्टी की परफॉर्मेंस बहुत ही डाउन हो गई और मनसे को सिर्फ एक सीट मिली।
यही नतीजे 2019 के विधानसभा चुनाव में देखने को मिले। 2019 में भी उनकी पार्टी एक सीट ही अपने नाम कर पाई। वहीं 2024 में भी मनसे का विधानसभा चुनाव में खाता भी नहीं खुल पाया। हालांकि अब दोनों ही पार्टी के नेता उम्मीद जता रहे हैं कि ठाकरे ब्रदर्स के साथ आने से महाराष्ट्र की राजनीति में नई पॉलिटिकल फोर्स का जन्म होगा।



