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पितृदोष क्या है? कारण, लक्षण और उपाय | ज्योतिष व धर्म ज्ञान का सम्पूर्ण मार्गदर्शन

पितृदोष क्या होता है समस्या का समाधान कैसे करें ज्योतिष धर्म ज्ञान आओ जानें

भारतीय ज्योतिष के अनुसार सूर्य इस सौर मंडल का राजा है और इससे पिता की स्थिति का अवलोकन किया जाता है। शनि सूर्य का पुत्र है, परन्तु सूर्य का परम शत्रु है।
शनि वायु विकार का कारक ग्रह है। राहु का फल भी शनि के समान ही है।
सूर्य आत्मा का कारक है इसलिए जब सूर्य
जन्म पत्रिका में अशुभ हो तो यह दोष कारक होता है। सूर्य जब शनि के प्रभाव में (साथ बैठकर या दृष्टि में रहकर) होता है, तो ऐसा जातक निश्चय ही पितृ दोष से पीड़ित होता है। जब शनि के साथ राहु भी सूर्य को पीड़ित
करता है, तो जातक के पिता अन्य चांडाल प्रकृत्ति की आत्माओं से भी पीड़ित हैं और यह दोष अधिक है।

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पितृदोष के प्रभाव
1. परिवार में प्रायः अनावश्यक तनाव रहता है।
2. बने-बनाये काम आखिरी समय पर बिगड़ जाते है।
3. अपेक्षित परिणाम अनावश्यक विलंब से मिलते है।
4. मांगलिक कार्य (विवाह योग्य संतानों के विवाह आदि) मे, सभी परिस्थितियां अनुकूल होने पर भी विलंब होता है।
5. भरपूर आमदनी के होते हुए भी बचत पक्ष कमजोर होता है।
6. पिता-पुत्र में अनावश्यक वैचारिक मतभेद होते है।
7. शरीर में अनावश्यक दर्द और भारीपन रहता है।
8. जातक व उसके परिवार का स्वयं के घर में मन नही लगता।

पितृ दोषों को स्थूल रूप से छः योगों में वर्गीकृत किया जा सकता है।
👇
1. गौत्र दोष
2. कुलदेवी दोष
3. डाकिनी-शाकिनी दोष
4. प्रेत दोष
5. क्षेत्रपाल दोष
6. बैताल दोष

1. गौत्र दोष :
गौत्र दोष में एक ही गौत्र के व्यक्तियों की संख्या धीरे-धीरे कम होने लगती है। पुत्र-पुत्री अर्थात संतान का अभाव होने लगता है। वंश वृद्धि तथा संतानोत्पत्ति के सभी उपाय व्यर्थ सिद्ध
होने लगते है। एक जाति विशेष इस दोष से पीड़ित है।

2. कुलदेवता व कुलदेवी दोष
आधुनिकता की चकाचौंध में धार्मिक मान्यताओं एवं आस्थाओं को अंधविश्वास करार देकर कुछ परिवारों में परम्परागत रूप से चली आ रही देवी-देवताओं की पूजा बंद कर दी जाती है या उसमें कुछ कमी आ जाती है।
कभी-कभी घर के बुजुर्ग भी इन परम्पराओं से पूर्णतया परिचित नहीं होते तथा पूजा अर्चना स्वयमेव बंद हो जाती है। इस अज्ञानता से उत्पन्न हुए दोषों को कुलदेवी दोष कहा जाता है।

3. डाकिनी-शाकिनी दोष
घर के पुरुष चारित्रिक रुप से भृष्ट होकर अन्य स्त्रियों के सम्पर्क में आकर अपनी पत्नि के साथ या घर की अन्य महिलाओं के साथ अन्याय करने लगे या शारीरिक प्रताड़ना देने लगें या उन्हें अकाल मृत्यु की ओर धकेल दें तो स्त्री
जाति के अपमान स्वरूप परिवार में पितृ दोष उत्पन्न हो जाता है। इस प्रकार के दोष को डाकिनी-शाकिनी दोष कहा जाता है। यह दोष अत्यधिक तीव्र व भयंकर रूप ले सकता
है। यदि किसी महिला की मृत्यु परिवार के किसी सदस्य के प्रताड़ित करने पर हो जायें।

4. प्रेत दोष
प्रेत दोष में जातक असामाजिक तत्वों के सम्पर्क में आकर उनसे व्यथित रहता है। रात-दिन भय के वातावरण में जीवित रहता है। इसी व्यवस्था में जीवित रहता है। इसी व्यवस्था तथा वातावरण में जातक का अंत हो जाता है।

5. क्षेत्रपाल दोष
जब रक्षक ही भक्षक बन जाए एवं जातक विश्वासघात में लिप्त हो जाए तो क्षेत्रपाल नाम का पितृदोष होता व लगता है।

6. बेताल दोष
यदि कोई जातक किसी की हत्या करे तो वह बेताल दोष से पीड़ित होता है।

पितृ दोष शांति के सामान्य उपाय👇

1. पितृपक्ष में गया जाकर पितरों का श्राद्ध करें
2. अपनी पुत्री के अतिरिक्त किसी का कन्यादान करें
3. गाय का दान करें या उसे हरा चारा खिलाएं
4. अपने वृद्ध माता-पिता की सेवा करें
5. भगवान श्रीहरि विष्णु की पूजा करें।
हरि ॐ नमो नारायण

ज्योतिष और लक्ष्मी योग
इस भौतिक मानवीय जीवन में से लक्ष्मी का प्रभुत्व छोड़दें तो शेष रह जाता है शून्य। लक्ष्मी है कि चिर युवा व चंचला होने के कारण एक जगह टिकती ही नहीं है।

चाणक्य ने ठीक ही कहा है कि निर्धनता आज के युग का सबसे बड़ा अभिशाप है। कैसी विचित्र सिथिति है कि शुक्र दैत्य गुरु है और बृहस्पति देवगुरु हैं। इनमें शुक्र संपत्ति का भोगव गुरु धनप्राप्ति कारक हैं एवं परस्पर शत्रु। दोनों की श्रेष्ठता हो तभी व्यक्ति धनोपार्जन कर, उसका भोग कर सकता है। आनन्द संग्रह कर सकता है। जन्मकुण्डली
में उक्त दोनों ग्रह अर्थात बृहस्पति व शुक्र दिनपति सूर्य व
निशानाथ चंद्रमा से अच्छा संबंध करते हों अर्थात इनके साथ हों या देखे जाते हों तो व्यक्ति जीवन में यथेष्टï मात्रा में धन संग्रह करता है। इसी कारण से शुक्र-चंद्र
लाटरी योग व गुरु-चंद्र गज-केसरी योग बनाते हैं।

वृष लग्न, कन्या लग्न और मकर लग्न में उत्पन्न जातकों में धन प्राप्त करने की इच्छा व लालसा अन्य लग्नोत्पन्न
जातकों से अधिक होती है लेकिन ये खर्च करना
नहीं चाहते। मकर लग्नोत्पन्न व्यक्ति परोपकार व
यशोपर्जन के लिए तो कम से कम धन खर्च कर ही
लेता है। मिथुन, तुला व कुम्भ लग्नोत्पन्न जातक का आकर्षण धन के प्रति होता है। वे मितव्ययी तो होते हैं
परन्तु कृपण नहीं। मेष, सिंह व धनु लग्न के जातक जीवन में हर भौतिक इच्छा पूर्ण करना चाहते
हैं। वे ऐश्वर्यपूर्ण जीवन व्यचीच करने का मुख्य साधन मानते हैं। सिंह लग्न का व्यक्ति इसमें सबसे आगे रहता है। चंद्रमा चलायमान, चंचल व भावुक ग्रह हैं, अत: कर्क लग्नोत्पन्न व मंगल राशि, वृश्चिक व मीन राशि लग्नोत्पन्न व्यक्ति अत्यन्त भावुक होते हैं। इनमें धन संग्रह करने की तीव्र आकांक्षी होती है। शुक्र भोग-सेक्स, भौतिक सुख, संपत्ति, विलासिता, ऐश्वर्य, आनन्द का सूचक ग्रह
है। बृहस्पति धन संपदा प्राप्ति कारक है। इस लेख में आपको विभिन्न ग्रहों की स्थिति, स्वामी एवं उच्च-नीच आदि शब्दों का प्रयोग जानना होगा, इसके लिए आपको इस सारणी का उपयोग फलदायक होगा। लग्न, पंचम एवं नवम भाव के स्वामी ग्रहों का चन्द्रमा व शुक्र सेसंबंध हो चो अचानक धन प्राप्त होता है। गुरु धन एवं समृद्धि का कारक है। चन्द्रमा तीव्रता का कारक है। शुक्र सौन्दर्य का, ऐश्वर्य का, गुप्त कार्यों का कारक है। यदि तीनों की स्थिति गोचर में जन्मकुण्डली के समन्वय करते हुए शुभ स्थानों में होती है साथ ही दशा अन्र्दशा भी अनुकूल हो तो व्यक्ति को अवश्य ही करोड़पति बना देती है। अब प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि यदि उपरोक्त धन प्राप्ति के यगो भी जन्म कुण्डली में स्थित है लेकिन किस समय कौनसी दशा अन्र्दशा में धन प्राप्ति का, करोड़पति बनने का योग घटित होगा?
त्रिकोण भाव के स्वामी ग्रहों की महादशा में या द्वितीय या एकादश भाव के स्वामी ग्रहों की महादशा एवं एकादश या द्वितीय भाव की अन्तर्दशा हो। पुन: इन्ही ग्रहों की प्रत्यन्तर दशा एवं सूक्ष्म दशा में परस्पर आपसी शुभ संबंध होने पर व्यक्ति करोड़पति बन जाता है।

कुछ योग:
द्वितीय, 8 व 9 भाव के स्वामी ग्रहों का केन्द्र त्रिकोण से शुभ संबंध होने पर साहसी, खतरनाक प्रतियोगिताओं, प्रतिस्पर्धाओं से धन प्राप्ति होती है।
लग्न, पंचम एवं नवम भाव का अथवा उनके स्वामी
ग्रहों का आपसी शुभ संबंध होने पर बुद्धि क्षमता
वाली प्रतियोगिताओं से धन प्राप्ति होती है।
धन, भाव एकादश भाव एवं भाग्य भाव में स्थित ग्रहों अथवा इन भावों से स्वामी ग्रहों का आपसी भाव
परिवर्तन होने पर करोड़पति अवश्य बनता है।
एकादशेश तथा द्वितीयेश चतुर्थ भाव में हों तथा
चतुर्थेश शुभ ग्रह की राशि में शुभ ग्रह से युत
अथवा दृष्ट हो तो जातक को आकस्मिक रूप से धन का लाभ हो तो जातक को आकस्मिक रूप से धन का लाभ होता है। यदि पंचम भाव में स्थित चन्द्रमा शुक्र से दृष्ट हो तो व्यक्ति को लाटरी, शेयर, सट्टे रेस आदि से धन प्राप्त होता है। यदि धनेश शनि हो और वह चतुर्थ, अष्टïम अथवा द्वादश
भाव में स्थित हो तथा बुध सप्तम भाव में स्वक्षैत्री
होकर स्थित हो तो आकस्मिक रूप से धन का लाभ होता है।
अब मैं प्रत्येक लग्न के अनुसार उनके धन-समृद्धि के योग
स्पष्टï कर रहा हूं।

मेष लग्न:
मेष लग्न हो, मंगल कमेश भाग्येश 5वें हो तो जातक लक्ष्याधिपति बनात हैं। मेष राशिस्थ लग्न की कुण्डली
में सूर्य स्व का हो, गुरु चंद्र की युति 11वें हों तो
जातक लक्ष्मीवान होता है।

वृष लग्न:
बुध एवं शनि द्वितीय स्थान में हों तो धन प्राप्ति
होती है। शुक्र मिथुन का हो, बुध मीन का हो, गुरु ध्रुव केन्द्र में हो ते जातक को यकायक अर्थ की प्राप्ति
होती है।

मिथुन लग्न:
भाग्येश भाग्य भवन में बैठकर बुध से युति करे तो द्रव्य
की प्राप्ति का योग होता है। द्वितीयेश
उच्च स्थान में बैठा ो तो पैतृक धन की प्राप्ति
होती है।

कर्क लग्न :
गुरु शत्रु भावस्था हो तथा केतु से युति करें तो जातक बहुत ऐश्वर्यवान, योग्य व राजनीति पटु होता है।
कर्क लग्न की कुण्डली में शुक्र 12वें या 2रे भाव में हो तो जातक धनवान होता है।

सिंह लग्न:
शुक्र बलवान होकर चतुर्थेश केसाथ चतुर्थ भाव में हो तो जातक को आजीवन सुख प्राप्त होता।
शुक्र सूर्य के नवांश में हो तो जातक ऊन, दवा, घास, धान, सोना, मोती आदि के व्यापार से अथोपार्जन करता है।

कन्या लग्न:
शुक्र व केतु दूसरे भाव में हो तो व्यक्ति धनाढ्य होता है तथा आकस्मिक ढंग से अर्थ की प्राप्ति होती
है। चन्द्रमा 10वें स्थान में मिथुन राशि का हो, दशमेश बुध लग्न में हो तथा भाग्येश शुक्र द्वितीय स्थान में हो तो जातक धनवान भाग्यवान व उच्च पदाधिकारी होता है।

तुला लग्न:
शुक्र यदि केतु सहित द्वितीय भाव में हो तो जातक को
निश्चय ही लक्ष्याधिपति बना देता है। जन्म का लग्न तुला हो तथा राहु, शुक्र, मंगल, शनि 12वें भाव में यानी कन्या राशि में हों तो जातक कुबेर से भी अधिक धनवान होता है।

वृश्चिक लग्न :
गुरु व बुध पंचम स्थान में हों तथा चंद्रमा 11 वें भावस्थ हो तो जातक करोड़पति होता है। चन्द्रमा गुरु, केतु नवम भाव में हों तो विशेष भाग्योदय होता है। चंद्रमा भाग्येश है, गुरु के साथ स्तित हो गज केशरी योग बनाता है, गुरु अपनी उच्च राशि में भी होता है जो कि धनेश है।

धनु लग्न:
गुरु, बुध लग्न में सूर्य, शुक्र द्वितीय भाव में मंगल,
राहु, षष्ठïम् भाव में तथा शेष 3 ग्रह अलग-अलग
कहीं भी हों तो जातकआजीवन सुख भोगता है। चंद्रमा 8वें भाव में हों, कर्क राशि में सूर्य शुक्र शनि स्थित हों तो विख्यात, शिल्पादि कलाओं का जानकार पतला पर दृढ़ शरीर से युक्त अनेक सन्तानों से युक्त व निरन्तर संपत्तिवान रहता है।

मकर लग्न :
चन्द्रमा व मंगल एक साथ 1/4/7/10 केन्द्र भावस्थ 5/9 त्रिकोण में अथवा 2/11 भाव में कही हो तो जातक
धनाढ्य होता है। धनेश तुला राशि में एवं लाभेश मंगल मकर राशिगत अर्थात् लग्न में हो तो जातक धनवान होता है।

कुंभ लग्न:
10वें भाव में अर्थात वृश्चिक राशि में चन्द्र शनि का योग हो तो वह जातक कुबेर तुल्य ऐश्वर्य सम्पन्न होता है।
कुंभ लग्न हो, शनि लग्न में स्व का स्थित हो, मंगल
की 8वीं दृष्टिï शनि पर हो तो राजराजेश्वर योग होने से जातक पूर्णरूपेण संपन्न, सुखी, धनवान, दीर्घायु होता है।

मीन लग्न :
यदि दूसरे भाव में चन्द्रमा एवं 5वें भाव में मंगल हो तो मंगलकी दशा में श्रेष्ठ धन लाभ होता है। गुरु 6वें भाव में हो, शुक्र 8वें, शनि 12वें तथा चन्द्रमा मंगल 11वें भावस्थ हों तो उच्चाति उच्च धनदायक योग बनात है।

कुंडली में धन योग से सम्बन्धित भाव

प्रथम भाव – व्यक्ति स्वयं

दूसरा भाव – धन भाव

पंचम भाव – त्रिकोण / लक्ष्मी भाव

नवम भाव – भाग्य स्थान

दशम भाव – कर्म भाव

एकादश भाव – लाभ भाव।

ऊपरी हवा पहचान और निदान

प्रायः सभी धर्मग्रंथों में ऊपरी हवाओं, नजर दोषों आदि का उल्लेख है। कुछ ग्रंथों में इन्हेंबुरी आत्मा कहा गया है तो कुछ अन्य में भूत-प्रेत और जिन्न।

यहां ज्योतिष के आधार पर नजर दोष का विश्लेषण प्रस्तुत है।

ज्योतिष सिद्धांत के अनुसार गुरु पितृदोष, शनि यमदोष, चंद्र व शुक्र जल देवी दोष, राहुसर्प व प्रेत दोष, मंगल शाकिनी दोष, सूर्य देव दोष एवं बुध कुल देवता दोष का कारकहोता है। राहु, शनि व केतु ऊपरी हवाओं के कारक ग्रह हैं। जब किसी व्यक्ति के लग्न(शरीर), गुरु (ज्ञान), त्रिकोण (धर्म भाव) तथा द्विस्वभाव राशियों पर पाप ग्रहों का प्रभावहोता है, तो उस पर ऊपरी हवा की संभावना होती है।

लक्षण
नजर दोष से पीड़ित व्यक्ति का शरीर कंपकंपाता रहता है। वह अक्सर ज्वर, मिरगीआदि से ग्रस्त रहता है।
कब और किन स्थितियों में डालती हैं ऊपरी हवाएं किसी व्यक्ति पर अपना प्रभाव?

👉 जब कोई व्यक्ति दूध पीकर या कोई सफेद मिठाई खाकर किसी चौराहे पर जाता है, तबऊपरी हवाएं उस पर अपना प्रभाव डालती हैं। गंदी जगहों पर इन हवाओं का वास होता है,इसीलिए ऐसी जगहों पर जाने वाले लोगों को ये हवाएं अपने प्रभाव में ले लेती हैं।

👉 इनहवाओं का प्रभाव रजस्वला स्त्रियों पर भी पड़ता है। कुएं, बावड़ी आदि पर भी इनका वासहोता है। विवाह व अन्य मांगलिक कार्यों के अवसर पर ये हवाएं सक्रिय होती हैं। इसकेअतिरिक्त रात और दिन के १२ बजे दरवाजे की चौखट पर इनका प्रभाव होता है।

👉 दूध व सफेद मिठाई चंद्र के द्योतक हैं। चौराहा राहु का द्योतक है। चंद्र राहु का शत्रु है।अतः जब कोई व्यक्ति उक्त चीजों का सेवन कर चौराहे पर जाता है, तो उस पर ऊपरीहवाओं के प्रभाव की संभावना रहती है।

👉 कोई स्त्री जब रजस्वला होती है, तब उसका चंद्र व मंगल दोनों दुर्बल हो जाते हैं। येदोनों राहु व शनि के शत्रु हैं। रजस्वलावस्था में स्त्री अशुद्ध होती है और अशुद्धता राहु कीद्योतक है। ऐसे में उस स्त्री पर ऊपरी हवाओं के प्रकोप की संभावना रहती है।

👉 कुएं एवं बावड़ी का अर्थ होता है जल स्थान और चंद्र जल स्थान का कारक है। चंद्र राहुका शत्रु है, इसीलिए ऐसे स्थानों पर ऊपरी हवाओं का प्रभाव होता है।

👉 जब किसी व्यक्ति की कुंडली के किसी भाव विशेष पर सूर्य, गुरु, चंद्र व मंगल का प्रभावहोता है, तब उसके घर विवाह व मांगलिक कार्य के अवसर आते हैं। ये सभी ग्रह शनि वराहु के शत्रु हैं, अतः मांगलिक अवसर
पर ऊपरी हवाएं व्यक्ति को परेशान कर सकती हैं।

👉 दिन व रात के १२ बजे सूर्य व चंद्र अपने पूर्ण बल की अवस्था में होते हैं। शनि व राहुइनके शत्रु हैं, अतः इन्हें प्रभावित करते हैं। दरवाजे की चौखट राहु की द्योतक है। अतःजब राहु क्षेत्र में चंद्र या सूर्य को बल मिलता है, तो ऊपरी हवा सक्रिय होने की संभावनाप्रबल होती है।

👉 मनुष्य की दायीं आंख पर सूर्य का और बायीं पर चंद्र का नियंत्रण होता है। इसलिएऊपरी हवाओं का प्रभाव सबसे पहले आंखों पर ही पड़ता है।

यहां ऊपरी हवाओं से संबद्ध ग्रहों, भावों आदि का विश्लेषण
राहु-केतु 👉 जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, शनिवत राहु ऊपरी हवाओं का कारक है।यह प्रेत बाधा का सबसे प्रमुख कारक है। इस ग्रह का प्रभाव जब भी मन, शरीर, ज्ञान,धर्म, आत्मा आदि के भावों पर होता है, तो ऊपरी हवाएं सक्रिय होती हैं।

शनि👉 इसे भी राहु के समान माना गया है। यह भी उक्त भावों से संबंध बनाकर भूत-प्रेतपीड़ा देता है।

चंद्र👉 मन पर जब पाप ग्रहों राहु और शनि का दूषित प्रभाव होता है और अशुभ भावस्थित चंद्र बलहीन होता है, तब व्यक्ति भूत-प्रेत पीड़ा से ग्रस्त होता है।

गुरु👉 गुरु सात्विक ग्रह है। शनि, राहु या केतु से संबंध होने पर यह दुर्बल हो जाता है।इसकी दुर्बल स्थिति में ऊपरी हवाएं जातक पर अपना प्रभाव डालती हैं।

लग्न👉 यह जातक के शरीर का प्रतिनिधित्व करता है। इसका संबंध ऊपरी हवाओं केकारक राहु, शनि या केतु से हो या इस पर मंगल का पाप प्रभाव प्रबल हो, तो व्यक्ति केऊपरी हवाओं से ग्रस्त होने की संभावना बनती है।

पंचम👉 पंचम भाव से पूर्व जन्म के संचित कर्मों का विचार किया जाता है। इस भाव परजब ऊपरी हवाओं के कारक पाप ग्रहों का प्रभाव पड़ता है, तो इसका अर्थ यह है कि व्यक्तिके पूर्व जन्म के अच्छे कर्मों में कमी है। अच्छे कर्म अल्प हों, तो प्रेत बाधा योग बनता है।

अष्टम👉 इस भाव को गूढ़ विद्याओं व आयु तथा मृत्यु का भाव भी कहते हैं। इसमें चंद्र औरपापग्रह या ऊपरी हवाओं के कारक ग्रह का संबंध प्रेत बाधा को जन्म देता है।

नवम👉 यह धर्म भाव है। पूर्व जन्म में पुण्य कर्मों में कमी रही हो, तो यह भाव दुर्बल होताहै।

राशियां👉 जन्म कुंडली में द्विस्वभाव राशियों मिथुन, कन्या और मीन पर वायु तत्व ग्रहोंका प्रभाव हो, तो प्र्रेत बाधा होती है।

वार👉 शनिवार, मंगलवार, रविवार को प्रेत बाधा की संभावनाएं प्रबल होती हैं।

तिथि👉 रिक्ता तिथि एवं अमावस्या प्रेत बाधा को जन्म देती है।

नक्षत्र👉 वायु संज्ञक नक्षत्र प्रेत बाधा के कारक होते हैं।

योग👉 विष्कुंभ, व्याघात, ऐंद्र, व्यतिपात, शूल आदि योग प्रेत बाधा को जन्म देते हैं।

करण👉 विष्टि, किस्तुन और नाग करणों के कारण व्यक्ति प्रेत बाधा से ग्रस्त होता है।

दशाएं👉 मुख्यतः शनि, राहु, अष्टमेश व राहु तथा केतु से पूर्णतः प्रभावित ग्रहों कीदशांतर्दशा में व्यक्ति के भूत-प्रेत बाधाओं से ग्रस्त होने की संभावना रहती है।

युति👉 किसी स्त्री के सप्तम भाव में शनि, मंगल और राहु या केतु की युति हो, तो उसके पिशाचपीड़ा से ग्रस्त होने की संभावना रहती है।

👉 गुरु नीच राशि अथवा नीच राशि के नवांश में हो, या राहु से युत हो और उस पर पाप ग्रहोंकी दृष्टि हो, तो जातक की चांडाल प्रवृत्ति होती है।

👉 पंचम भाव में शनि का संबंध बने तो व्यक्ति प्रेत एवं क्षुद्र देवियों की भक्ति करता है।

ऊपरी हवाओं के कुछ अन्य मुख्य ज्योतिषीय योग
👉 यदि लग्न, पंचम, षष्ठ, अष्टम या नवम भाव पर राहु, केतु, शनि, मंगल, क्षीण चंद्रआदि का प्रभाव हो, तो जातक के ऊपरी हवाओं से ग्रस्त होने की संभावना रहती है।

यदि उक्त ग्रहों का परस्पर संबंध हो, तो जातक प्रेत आदि से पीड़ित हो सकता है।
👉 यदि पंचम भाव में सूर्य और शनि की युति हो, सप्तम में क्षीण चंद्र हो तथा द्वादश में गुरुहो, तो इस स्थिति में भी व्यक्ति प्रेत बाधा का शिकार होता है।

👉 यदि लग्न पर क्रूर ग्रहों की दृष्टि हो, लग्न निर्बल हो, लग्नेश पाप स्थान में हो अथवाराहु या केतु से युत हो, तो जातक जादू-टोने से पीड़ित होता है।

👉 लग्न में राहु के साथ चंद्र हो तथा त्रिकोण में मंगल, शनि अथवा कोई अन्य क्रूर ग्रहहो, तो जातक भूत-प्रेत आदि से पीड़ित होता है।

👉 यदि षष्ठेश लग्न में हो, लग्न निर्बल हो और उस पर मंगल की दृष्टि हो, तो जातकजादू-टोने से पीड़ित होता है। यदि लग्न पर किसी अन्य शुभ ग्रह की दृष्टि न हो, तोजादू-टोने से पीड़ित होने की संभावना प्रबल होती है।

👉 षष्ठेश के सप्तम या दशम में स्थितहोने पर भी जातक जादू-टोने से पीड़ित हो सकता है।

👉 यदि लग्न में राहु, पंचम में शनि तथा अष्टम में गुरु हो, तो जातक प्रेत शाप से पीड़ितहोता है।

ऊपरी हवाओं के सरल उपाय

ऊपरी हवाओं से मुक्ति हेतु शास्त्रों में अनेक उपाय बताए गए हैं। अथर्ववेद में इस हेतुकई मंत्रों व स्तुतियों का उल्लेख है। आयुर्वेद में भी इन हवाओं से मुक्ति के उपायों काविस्तार से वर्णन किया गया है। यहां कुछ प्रमुख सरल एवं प्रभावशाली उपायों का विवरण प्रस्तुत है।

👉 ऊपरी हवाओं से मुक्ति हेतु हनुमान चालीसा का पाठ और गायत्री का जप तथा हवनकरना चाहिए। इसके अतिरिक्त अग्नि तथा लाल मिर्ची जलानी चाहिए।

👉 रोज सूर्यास्त के समय एक साफ-सुथरे बर्तन में गाय का आधा किलो कच्चा दूध लेकरउसमें शुद्ध शहद की नौ बूंदें मिला लें। फिर स्नान करके, शुद्ध वस्त्र पहनकर मकान कीछत से नीचे तक प्रत्येक कमरे, जीने, गैलरी आदि में उस दूध के छींटे देते हुए द्वार तकआएं और बचे हुए दूध को मुख्य द्वार के बाहर गिरा दें।

👉 क्रिया के दौरान इष्टदेव का स्मरणकरते रहें। यह क्रिया इक्कीस दिन तक नियमित रूप से करें, घर पर प्रभावी ऊपरी हवाएंदूर हो जाएंगी।

👉 रविवार को बांह पर काले धतूरे की जड़ बांधें, ऊपरी हवाओं से मुक्ति मिलेगी।

👉 लहसुन के रस में हींग घोलकर आंख में डालने या सुंघाने से पीड़ित व्यक्ति को ऊपरीहवाओं से मुक्ति मिल जाती है।

ऊपरी बाधाओं से मुक्ति हेतु निम्नोक्त मंत्र का यथासंभव जप करना चाहिए।

👉 ॐ नमो भगवते रुद्राय नमः कोशेश्वस्य नमो ज्योति पंतगाय नमो रुद्रायनमः सिद्धि स्वाहा।श्श्

👉 घर के मुख्य द्वार के समीप श्वेतार्क का पौधा लगाएं, घर ऊपरी हवाओं से मुक्त रहेगा।

👉 उपले या लकड़ी के कोयले जलाकर उसमें धूनी की विशिष्ट वस्तुएं डालें और उससेउत्पन्न होने वाला धुआं पीड़ित व्यक्त्ि को सुंघाएं। यह क्रिया किसी ऐसे व्यक्ति सेकरवाएं जो अनुभवी हो और जिसमें पर्याप्त आत्मबल हो।

👉 प्रातः काल बीज मंत्र झ्क्लींश् का उच्चारण करते हुए काली मिर्च के नौ दाने सिर परसे घुमाकर दक्षिण दिशा की ओर फेंक दें, ऊपरी बला दूर हो जाएगी।

👉 रविवार को स्नानादि से निवृत्त होकर काले कपड़े की छोटी थैली में तुलसी के आठपत्ते, आठ काली मिर्च और सहदेई की जड़ बांधकर गले में धारण करें, नजर दोष बाधा सेमुक्ति मिलेगी।

👉 निम्नोक्त मंत्र का १०८ बार जप करके सरसों का तेल अभिमंत्रित कर लें और उससेपीड़ित व्यक्ति के शरीर पर मालिश करें, व्यकित पीड़ामुक्त हो जाएगा।

मंत्र – ओम नमो काली कपाला देहि देहि स्वाहा।

👉 ऊपरी हवाओं के शक्तिषाली होने की स्थिति में शाबर मंत्रों का जप एवं प्रयोग कियाजा सकता है। प्रयोग करने के पूर्व इन मंत्रों का दीपावली की रात को अथवा होलिका दहनकी रात को जलती हुई होली के सामने या फिर श्मषान में १०८ बार जप कर इन्हें सिद्धकर लेना चाहिए।

यहां यह उल्लेख कर देना आवष्यक है कि इन्हें सिद्ध करने के इच्छुकसाधकों में पर्याप्त आत्मबल होना चाहिए, अन्यथा हानि हो सकती है।

👉 निम्न मंत्र से थोड़ा-सा जीरा ७ बार अभिमंत्रित कर रोगी के शरीर से स्पर्श कराएंऔर उसे अग्नि में डाल दें। रोगी को इस स्थिति में बैठाना चाहिए कि उसका धूंआ उसकेमुख के सामने आये। इस प्रयोग से भूत-प्रेत बाधा की निवृत्ति होती है।

मंत्र
जीरा जीरा महाजीरा जिरिया चलाय। जिरिया कीशक्ति से फलानी चलिजाय॥ जीये तो रमटले मोहे तो मशान टले। हमरे जीरा मंत्र से अमुख अंग भूत चले॥ जायहुक्म पाडुआ पीर की दोहाई॥

👉 एक मुट्ठी धूल को निम्नोक्त मंत्र से ३ बार अभिमंत्रित करें और नजर दोष से ग्रस्तव्यक्ति पर फेंकें, व्यक्ति को दोष से मुक्ति मिलेगी।

मंत्र
तह कुठठ इलाही का बान। कूडूम की पत्ती चिरावन। भाग भाग अमुक अंक सेभूत। मारुं धुलावन कृष्ण वरपूत। आज्ञा कामरु कामाख्या। हारि दासीचण्डदोहाई।

👉 थोड़ी सी हल्दी को ३ बार निम्नलिखित मंत्र से

अभिमंत्रित करके अग्नि में इसतरह छोड़ें कि उसका धुआं रोगी के मुख की ओर जाए। इसे हल्दी बाण मंत्र कहते हैं।

मंत्र
हल्दी गीरी बाण बाण को लिया हाथ उठाय। हल्दी बाण से नीलगिरी पहाड़थहराय॥ यह सब देख बोलत बीर हनुमान। डाइन योगिनी भूत प्रेत मुंड काटौ तान॥आज्ञा कामरु कामाक्षा माई। आज्ञा हाड़ि की चंडी की दोहाई॥

👉 जौ, तिल, सफेद सरसों, गेहूं, चावल, मूंग, चना, कुष, शमी, आम्र, डुंबरक पत्ते औरअषोक, धतूरे, दूर्वा, आक व ओगां की जड़ को मिला लें और उसमें दूध, घी, मधु और गोमूत्रमिलाकर मिश्रण तैयार कर लें। फिर संध्या काल में हवन करें और निम्न मंत्रों का १०८बार जप कर इस मिश्रण से १०८ आहुतियां दें।

मंत्र
मंत्र रू ओम नमः भवे भास्कराय आस्माक अमुक सर्व ग्रहणं पीड़ा नाशनं कुरु-कुरु स्वाहा।

मन्त्र के आठ दोष

मन्त्र के बारे में लोगों में बहुत भ्रान्ति है, अगर किसी को समजाया जाए की मन्त्र करने के यह विधि निषेध है तो लोग सामने से ज्ञान देते है की भगवन की भक्ति में दोष कैसा? उसका उत्तर है आप भगवन्नाम का कीर्तन करो वो भक्ति मार्ग है, उसमे कोई बाधा नहीं कोई मात्रा छंद बिज आदि का बंधन नहीं। भक्ति आनंद स्वरूप है।

मन्त्र उपासना मार्ग है, और मन्त्र केवल गुरु से प्राप्त हो वही फलीभूत होता है, उपासना मार्ग के विधिनिषेध, बहुत सारे यम नियम है जिनका पालन न किया जाए तो मंत्र विपरीत असर करता है, कई लोग प्रश्न करते है हम यह देवी वो देवता का मंत्र करते है पर वह फलीभूत नहीं होता उसके कुछ दोष नीचे दिए गए है।

(1) अभक्ति दोष 👉 मन्त्र को अक्षर एवं वर्णों की समष्टि मात्र समझना अभक्ति दोष है ।

(2) अक्षरभ्रान्ति दोष 👉 मन्त्राक्षरों में उलट-फेर या एकाध अक्षर बढ़ जाना अक्षरभ्रान्ति दोष है ।

(3) लुप्त दोष 👉 मन्त्राक्षरों में किसी वर्ण की न्यूनता हो जाना लुप्त दोष है ।

(4) ह्रस्व दोष 👉 मन्त्र में किसी दीर्घ वर्ण का ह्रस्व हो जाना ह्रस्व दोष है ।

(5) दीर्घ दोष 👉 ह्रस्व वर्ण के स्थान में दीर्घ वर्ण कर देना दीर्घ दोष है ।

(6) कथन दोष 👉 जाग्रत् अवस्था में अपना मन्त्र किसी से कह देना कथन दोष है ।

(7) छिन्न दोष 👉 संयुक्त वर्णों में से किसी वर्ण का छूट जाना छिन्न दोष है ।

(8) स्वप्नकथन दोष 👉 स्वप्न में अपना मन्त्र किसी को बता देना स्वप्नकथन दोष होता है।

मन्त्र के एक-एक अक्षर के उच्चारण में परमानन्द का अनुभव करते हुए उसका जप करने से शीघ्र सिद्धि प्राप्त होती है, क्योंकि – ‘संविदेव मन्त्र: ‘ अर्थात् मन्त्र संवित् तत्त्व है ।

याद रहें मंत्र तारक भी है और मारक भी है। जो विधिनिषेध यम नियम पालन नहीं कर सकते उनके लिए भगवन्नाम कीर्तन ही तारक है, उनके लिए भक्तिमार्ग ही उत्तम है।

शमी वृक्ष की पूजा करने के नियम

स्नानोपरांत साफ कपड़े धारण करें। फिर प्रदोषकाल में शमी के पेड़ के पास जाकर सच्चे मन से प्रमाण कर उसकी जड़ को गंगा जल, नर्मदा का जल या शुद्ध जल चढ़ाएं। उसके बाद तेल या घी का दीपक जलाकर उसके नीचे अपने शस्त्र रख दें।
फिर पेड़ के साथ शस्त्रों को धूप, दीप, मिठाई चढ़ाकर आरती कर पंचोपचार अथवा षोडषोपचार पूजन करें। साथ ही हाथ जोड़ कर सच्चे मन से यह प्रार्थना करें।

‘शमी शम्यते पापम् शमी शत्रुविनाशिनी।
अर्जुनस्य धनुर्धारी रामस्य प्रियदर्शिनी।।
करिष्यमाणयात्राया यथाकालम् सुखम् मया।
तत्रनिर्विघ्नकर्त्रीत्वं भव श्रीरामपूजिता।।’

इसका अर्थ है👉 हे शमी वृक्ष आप पापों को नाश और दुश्मनों को हराने वाले है। आपने ही शक्तिशाली अर्जुन का धनुश धारण किया था। साथ ही आप प्रभु श्रीराम के अतिप्रिय है। ऐसे में आज हम भी आपकी पूजा कर रहे हैं। हम पर कृपा कर हमें सच्च व जीत के रास्ते पर चलने की प्रेरणा दें। साथ ही हमारी जीत के रास्ते पर आने वाली सभी बांधाओं को दूर कर हमें जीत दिलाए।

यह प्रार्थना करने के बाद अगर आपको पेड़ के पास कुछ पत्तियां गिरी मिलें तो उसे प्रसाद के तौर पर ग्रहण करें। साथ ही बाकी की पत्तियों को लाल रंग के कपड़े में बांधकर हमेशा के लिए अपने पास रखें। इससे आपके जीवन की परेशानियां दूर होने के साथ दुश्मनों से छुटकारा मिलेगा। इस बात का खास ध्यान रखें कि आपकी पेड़ से अपने आप गिरी पत्तियां उठानी है। खुद पेड़ से पत्तों को तोड़ने की गलती न करें।

शमी वृक्ष के गुण एवं महत्त्व

शमी को गणेश जी का प्रिय वृक्ष माना जाता है और इसकी पत्तियाँ गणेश जी की पूजा में भी चढ़ाई जाती हैं। जिसमें शिव का वास भी माना गया है, जो श्री गणेश के पिता हैं और मानसिक क्लेशों से मुक्ति देने वाले देव हैं। यही कारण है कि शमी पत्र का चढ़ावा श्री गणेश की प्रसन्नता से बुद्धि को पवित्र कर मानसिक बल देने वाला माना गया है। अगर आप भी मन और परिवार को शांत और सुखी रखना चाहते हैं तो नीचे बताए विशेष मंत्र से श्री गणेश को शमी पत्र अर्पित करें –

त्वत्प्रियाणि सुपुष्पाणि कोमलानि शुभानि वै।
शमी दलानि हेरम्ब गृहाण गणनायक।।

शमी भगवान श्री राम का प्रिय वृक्ष था और लंका पर आक्रमण से पहले उन्होंने शमी वृक्ष की पूजा कर के उससे विजयी होने का आशीर्वाद प्राप्त किया था। आज भी कई स्थानों पर ‘रावण दहन’ के बाद घर लौटते समय शमी के पत्ते स्वर्ण के प्रतीक के रूप में एक दूसरे को बाँटने की प्रथा हैं, इसके साथ ही कार्यों में सफलता मिलने कि कामना की जाती है।

शमी शमयते पापं शमी शत्रु विनाशिनी।
अर्जुनस्य धनुर्धारी रामस्य प्रियदर्शिनी।।
करिष्यमाणयात्राया यथाकालं सुखं मया।
तत्र निर्विघ्न कर्तृत्वं भवश्रीरामपूजिता।।

शमी पापों का नाश करने वाले और दुश्मनों को पराजित करने वाले है.अर्जुन का धनुष धारण करने वाले ; श्रीराम को प्रिय है.जिस तरह श्रीराम ने आपकी पूजा करी , हम भी करते है. अच्छाई की जीत में आने वाली सभी बाधाओं को दूर कर उसे सुखमय बना देते है।

👉यह वृक्ष जेठ के महीने में भी हरा रहता है। ऐसी गर्मी में जब रेगिस्तान में जानवरों के लिए धूप से बचने का कोई सहारा नहीं होता तब यह पेड़ छाया देता है। जब खाने को कुछ नहीं होता है तब यह चारा देता है, जो लूंग कहलाता है।

👉 इसका फूल मींझर कहलाता है। इसका फल सांगरी कहलाता है, जिसकी सब्जी बनाई जाती है। यह फल सूखने पर खोखा कहलाता है जो सूखा मेवा है।

👉 इसकी लकडी मजबूत होती है जो किसान के लिए जलाने और फर्नीचर बनाने के काम आती है। इसकी जड़ से हल बनता है।

👉 वराहमिहिर के अनुसार जिस साल शमीवृक्ष ज्यादा फूलता-फलता है उस साल सूखे की स्थिति का निर्माण होता है। विजयादशमी के दिन इसकी पूजा करने का एक तात्पर्य यह भी है कि यह वृक्ष आने वाली कृषि विपत्ती का पहले से संकेत दे देता है जिससे किसान पहले से भी ज्यादा पुरुषार्थ करके आनेवाली विपत्ती से निजात पा सकता है।

👉 अकाल के समय रेगिस्तान के आदमी और जानवरों का यही एक मात्र सहारा है। सन १८९९ में दुर्भिक्ष अकाल पड़ा था जिसको छपनिया अकाल कहते हैं, उस समय रेगिस्तान के लोग इस पेड़ के तनों के छिलके खाकर जिन्दा रहे थे।

👉 इस पेड़ के नीचे अनाज की पैदावार ज्यादा होती है।

👉 पांडवों द्वारा अज्ञातवास के अंतिम वर्ष में गांडीव धनुष इसी पेड़ में छुपाए जाने के उल्लेख मिलते हैं।

👉 शमी या खेजड़ी के वृक्ष की लकड़ी यज्ञ की समिधा के लिए पवित्र मानी जाती है। वसन्त ऋतु में समिधा के लिए शमी की लकड़ी का प्रावधान किया गया है। इसी प्रकार वारों में शनिवार को शमी की समिधा का विशेष महत्त्व है।

👉 शमी शनि ग्रह का पेड़ है. राजस्थान में सबसे अधिक होता है . छोटे तथा मोटे काँटों वाला भारी पेड़ होता है.

👉 कृष्ण जन्मअष्टमी को इसकी पूजा की जाती है . बिस्नोई समाज ने इस पेड़ के काटे जाने पर कई लोगों ने अपनी जान दे दी थी।

👉 कहा जाता है कि इसके लकड़ी के भीतर विशेष आग होती है जो रगड़ने पर निकलती है. इसे शिंबा; सफेद कीकर भी कहते हैं।

👉 घर के ईशान में आंवला वृक्ष, उत्तर में शमी (खेजड़ी), वायव्य में बेल (बिल्व वृक्ष) तथा दक्षिण में गूलर वृक्ष लगाने को शुभ माना गया है।

👉 कवि कालिदास ने शमी के वृक्ष के नीचे बैठ कर तपस्या कर के ही ज्ञान की प्राप्ति की थी।

👉 ऋग्वेद के अनुसार आदिम काल में सबसे पहली बार पुरुओं ने शमी और पीपल की टहनियों को रगड़ कर ही आग पैदा की थी।

👉 कवियों और लेखकों के लिये शमी बड़ा महत्व रखता है। भगवान चित्रगुप्त को शब्दों और लेखनी का देवता माना जाता है और शब्द-साधक यम-द्वितीया को यथा-संभव शमी के पेड़ के नीचे उसकी पत्तियों से उनकी पूजा करते हैं।

👉 नवरात्र में मां दुर्गा की पूजा भी शमी वृक्ष के पत्तों से करने का शास्त्र में विधान है। इस दिन शाम को वृक्ष का पूजन करने से आरोग्य व धन की प्राप्ति होती है।

👉कहते है एक आक के फूल को शिवजी पर चढ़ाना से सोने के दान के बराबर फल देता है , हज़ार आक के फूलों कि अपेक्षा एक कनेर का फूल, हज़ार कनेर के फूलों के चढाने कि अपेक्षा एक बिल्व-पत्र से मिल जाता है। हजार बिल्वपत्रों के बराबर एक द्रोण या गूमा फूल फलदायी। हजार गूमा के बराबर एक चिचिड़ा, हजार चिचिड़ा के बराबर एक कुश का फूल, हजार कुश फूलों के बराबर एक शमी का पत्ता, हजार शमी के पत्तो के बराबर एक नीलकमल, हजार नीलकमल से ज्यादा एक धतूरा और हजार धतूरों से भी ज्यादा एक शमी का फूल शुभ और पुण्य देने वाला होता है। इसलिए भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए एक शमी का पुष्प चढ़ाएं क्योंकि यह फूल शुभ और पुण्य देने वाला होता है।

👉 इसमें औषधीय गुण भी है. यह कफनाशक ,मासिक धर्म की समस्याओं को दूर करने वाला और प्रसव पीड़ा का निवारण करने वाला पौधा है. शन्नोदेवीरभीष्टय आपो भवन्तु पीतये
शन्नोदेवीरभीष्टय

शमी पोधे की पूजा करने से आपको क्या क्या लाभ मिलता है।

शमी शनिदेव को प्रिय है इसलिए शमी की पूजा सेवा करने से शनि की कृपा प्राप्त होती है और समस्त संकटों का नाश होता है।

आइये जानते हैं शमी के पौधे के क्या-क्या उपाय किए जा सकते हैं:
👉 इसके जड़ को शनि रत्न के स्थान पर धारण कर सकते हैं। पुष्प का अनन्त महात्म्य है।

👉 यदि परिवार में धन का अभाव बना हुआ है। खूब मेहनत करने के बाद भी धन की कमी है और खर्च अधिक है तो किसी शुभ दिन शमी का पौधा खरीदकर घर ले आएं। शनिवार के दिन प्रातः स्नानादि से निवृत्त होकर नए गमले में शुद्ध मिट्टी भरकर शमी का पौधा लगा दें। इसके बाद शमी पौधे की जड़ में एक पूजा की सुपारी. अक्षत पौधे पर गंगाजल अर्पित करें और पूजन करें। पौधे में रोज पानी डालें और शाम के समय उसके समीप एक दीपक लगाएं। आप स्वयं देखेंगे धीरे-धीरे आपके खर्च में कमी आने लगेगी और धन संचय होने लगेगा।

👉 शनिवार को शाम के समय शमी के पौधे के गमले में पत्थर या किसी भी धातु का एक छोटा सा शिवलिंग स्थापित करें। शिवलिंग पर दूध अर्पित करें और विधि-विधान से पूजन करने के बाद महामृत्युंजय मंत्र की एक माला जाप करें। इससे स्वयं या परिवार में किसी को भी कोई रोग होगा तो वह जल्दी ही दूर हो जाएगा।

👉 कई सारे युवक-युवतियों के विवाह में बाधा आती है। विवाह में बाधा आने का एक कारण जन्मकुंडली में शनि का दूषित होना भी है। किसी भी शनिवार से प्रारंभ करते हुए लगातार 45 दिनों तक शाम के समय शमी के पौधे में घी का दीपक लगाएं और सिंदूर से पूजन करें। इस दौरान अपने शीघ्र विवाह की कामना व्यक्त करें। इससे शनि दोष समाप्त होगा और विवाह में आ रही बाधाएं समाप्त होंगी।

👉 जन्मकुंडली में यदि शनि से संबंधित कोई भी दोष है तो शमी के पौधे को घर में लगाना और प्रतिदिन उसकी सेवा-पूजा करने से शनि की पीड़ा समाप्त होती है।

👉 जिन लोगों को शनि की साढ़े साती या ढैया चल रहा हो उन्हें नियमित रूप से शमी के पौधे की देखभाल करना चाहिए। उसमें रोज पानी डालें, उसके समीप शाम के समय दीपक लगाएं। शनिवार को पौधे में थोड़े से काले तिल और काले उड़द अर्पित करें। इससे शनि की साढ़ेसाती का दुष्प्रभाव कम होता।

यदि आप बार-बार दुर्घटनाग्रस्त हो रहे हों तो शमी के पौधे के नियमित दर्शन से दुर्घटनाएं रुकती हैं।

आप भी अपना जन्म विवरण भेजकर अपना वर्तमान, भूतकाल और भविष्य विस्तृत जानकारी ग्रह दोष और निवारण जान सकते है

तीन बातें हमेशा याद रखें:-

1.मालिक देख रहा हैं
2.फरिश्ते लिख रहे है
3.मौत हर हाल में आनी है.!

आप सभी हर पल स्वस्थ रहें

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Author: sssrknews

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